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587 phrases

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इन शब्दों का कान से अभ्यास करें
  1. मूल्यांकन और अनिवार्यतामिलनाइतने बरसों बाद, शायद वे ऐसे दो लोग थे जिनका मिलना नियति में लिखा ही था।
  2. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशरवैया; प्रतिक्रिया (सामने वाले की)कुशल वार्ताकार वही है जो सामने वाले की चाल भाँपते हुए हालात के मुताबिक शर्तें दोबारा गढ़ सके।
  3. तर्क और वाद-विवादघटनावही घटना, देखने का धरातल बदल दें तो, बिलकुल अलग अर्थ धारण कर लेती है।
  4. वर्णन और अलंकारनिकास; बाहर जाने का रास्ताबातचीत चट्टान से टकरा गई, मानो हम ऐसे भूलभुलैया में भटक रहे हों जिसका निकास ही न दिखे।
  5. ज़ोर, सीमा और चरमडिज़ाइनइस साल का नया उत्पाद, चाहे डिज़ाइन देखें या उपयोगिता, प्रतिस्पर्धियों से कहीं आगे है।
  6. तर्क और वाद-विवादडिजिटलडिजिटलीकरण के साथ हमारा श्रम पहले से बिलकुल अलग एक धरातल पर खिसकता जा रहा है।
  7. जीवन और मूल्यफिर से शुरू करनाशुरुआती संकल्प पर लौटकर, शून्य से फिर शुरू करने की ठान के साथ मैं इस कठिन दौर का सामना करना चाहता हूँ।
  8. समाज और सामयिक विषयअपस्फीतिजब तक लंबी अपस्फीति से बाहर नहीं निकलते, असली आर्थिक सुधार की उम्मीद बेमानी है।
  9. भाषा और मीडियाअफ़वाहअफवाह का फैलाव रोकने के लिए सुधार-सूचना को उससे भी तेज़ रफ्तार से फैलाना ज़रूरी है।
  10. समाज और सामयिक विषयप्रदर्शनअधिकारियों ने लंबे समय से चल रहे विरोध प्रदर्शनों को ज़बरन हटाने का क़दम उठाया।
  11. उन्नत केइगो और औपचारिकतामहामहिममुझे यह अत्यंत सम्मानजनक अवसर प्राप्त हुआ कि मैं महामहिम के समक्ष अपने शोध-परिणाम प्रस्तुत कर सकूँ।
  12. प्रकृति और जीवनबिजली; बत्तीबिजली और गैस जैसी बुनियादी सेवाओं की बहाली में अभी कई हफ्ते और लगने की उम्मीद है।
  13. क़ानून और संस्थाएँइलेक्ट्रॉनिकभले ही प्रक्रियाएँ डिजिटल हो गई हों, बुज़ुर्गों के लिए दफ़्तरों की जटिलता आज भी बड़ी दीवार बनी हुई है।
  14. ज़ोर, सीमा और चरमट्रेनखचाखच भरी ट्रेन में रोज़ का सफ़र कितना झंझट भरा है, यह बयान से बाहर है।
  15. संस्कृति और कलापरंपरा; लोककथाऐतिहासिक तथ्य और किंवदंती में कड़ा भेद करना इतिहास-अनुसंधान का बुनियादी अनुशासन है।
  16. ज़ोर, सीमा और चरमपरंपराअगर इस पारंपरिक कला को आगे बढ़ाने का ज़िम्मा किसी को सौंपना हो, तो उस उस्ताद के अलावा कोई नाम सूझता ही नहीं।
  17. ज़ोर, सीमा और चरमफ़ोन; टेलीफ़ोनयूँ हिचकिचाते मत रहो — फ़ोन करो या मेल भेजो, पहले उसी से पूछ लो।
  18. ज़ोर, सीमा और चरमडेटाइस सामग्री को छाप लें या डिजिटल रूप में साझा कर लें — जिस तरीके से सुविधा हो, उसी तरह इस्तेमाल करें।
  19. संस्कृति और कलाराजधानीअनगिनत युद्धकालों से गुज़रने के बाद इस नगर ने आखिरकार शांति पुनः प्राप्त कर ली।
  20. शैक्षणिकप्रश्नजीन प्रभावी हैं या परिवेश — यह सवाल अब निरर्थक ही कहा जाना चाहिए।
  21. ज़ोर, सीमा और चरमपूछताछ करनाअगर कोई शंका है, तो बॉस से सलाह लो या किसी विशेषज्ञ से पूछो — किसी भी तरह जल्दी हल कर लो।
  22. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावकड़ाई से पूछनाशायद हालात भाँपकर उसने आगे और कुछ पूछने की कोशिश नहीं की।
  23. प्रकृति और जीवनपुनर्विचारगरिमामय मृत्यु पर चलती बहस, हर हाल में जीवन लंबा करने की सोच पर एक मौन पुनर्विचार भी है।
  24. उन्नत व्यावसायिकसमग्र पर्यवेक्षणइस पूरी परियोजना की देखरेख करने वाले के नाते हर विभाग के हितों में तालमेल बैठाना मेरा दायित्व है।
  25. उन्नत केइगो और औपचारिकतासंबंधित; उक्तविभिन्न परिस्थितियों को देखते हुए, मैं फ़िलहाल इस परियोजना से अलग होने का निश्चय करता हूँ।
  26. समाज और सामयिक विषयअधिकारी वर्गअधिकारियों ने लंबे समय से चल रहे विरोध प्रदर्शनों को ज़बरन हटाने का क़दम उठाया।
  27. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशआँकड़े; सांख्यिकीआँकड़ों को अपनी सुविधा से काट-छाँटकर पेश करना — इस पर स्वार्थपरक तोड़-मरोड़ का आरोप लगे तो कोई अचरज नहीं।
  28. मूल्यांकन और अनिवार्यतापोस्टकंपनी की गोपनीय सामग्री सोशल मीडिया पर न डालें — सेवा-नियमों में यह साफ़ लिखा है।
  29. समाज और सामयिक विषयएकीकरण; विलयबड़े बैंक द्वारा विलय की अचानक घोषणा से पूरे वित्तीय क्षेत्र में हलचल फैल रही है।
  30. संयोजक और शर्तेंनिवेशवैश्विक मंदी का दौर था, इसलिए हर कंपनी को निवेश रोकना ही पड़ा।
  31. उन्नत व्यावसायिकहमारी कंपनीघोटाले के बाद हमारी कंपनी ने ज़िम्मेदारी की जगह साफ़ करने और नियम-पालन व्यवस्था दोबारा खड़ी करने का काम शुरू किया।
  32. उन्नत व्यावसायिकप्रारंभिक; शुरू मेंमूल योजना के मुक़ाबले प्रगति ठीक न होने के कारण हमें पूरे कार्यक्रम-चार्ट पर ही नए सिरे से विचार करना पड़ेगा।
  33. उन्नत केइगो और औपचारिकताउस समयसंलग्न तस्वीर मैंने देख ली है। उसमें उन दिनों की झलक बख़ूबी उतर आई है।
  34. क़ानून और संस्थाएँपक्षकार; संबंधित पक्षअनुबंध के दोनों पक्षकारों का वयस्क होना अनिवार्य है।
  35. उन्नत केइगो और औपचारिकताउसी दिनउस दिन संचालन का दायित्व मेरा रहेगा, इसलिए जो भी आवश्यकता हो, नि:संकोच कहिएगा।
  36. उन्नत व्यावसायिकनियंत्रणआंतरिक नियंत्रण को प्रभावी बनाने के लिए हमने सौंपे गए अधिकारों का दायरा नियमावली में लिखित रूप से तय किया।
  37. मूल्यांकन और अनिवार्यतास्वाभाविक रूप से; ज़ाहिर हैउसके जैसी काबिलियत हो, तो उसका चुना जाना स्वाभाविक ही था — कंपनी में यह बात सब मानते हैं।
  38. वर्णन और अलंकारप्रकाशस्तंभगहरे नीले समुद्र की पृष्ठभूमि में लाइटहाउस का सफ़ेद रंग ख़ास तौर पर उभरकर नज़र खींच रहा था।
  39. संयोजक और शर्तेंकिसी भी तरह (नहीं)चाहे कितना ही बड़ा विशेषज्ञ क्यों न हो, भविष्य को पूरी तरह ठीक-ठीक बताना किसी के बस की बात नहीं।
  40. वर्णन और अलंकारपारदर्शी; स्पष्टअनगिनत प्रविष्टियों के बीच उसकी कविता की निर्मल शांति अलग ही चमक रही थी।
  41. ज़ोर, सीमा और चरमहमारी दुकानइकतीस मार्च को हमारी दुकान अपने लंबे इतिहास पर पर्दा गिरा देगी।
  42. वर्णन और अलंकारसंबंधित; प्रश्नगतजिसकी बात थी वही व्यक्ति बिलकुल शांत था और आसपास की हलचल के बीच सहज भाव से निपटता रहा।
  43. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भाव(आधिकारिक) उत्तरनेताओं के जवाब ऐसे होते हैं कि पंक्तियों के बीच पढ़े बिना उनका असली मतलब पकड़ में ही नहीं आता।
  44. क़ानून और संस्थाएँफ़िलहालनई व्यवस्था में जाते समय, संक्रमणकालीन उपाय के तौर पर फ़िलहाल पुराने नियम भी साथ-साथ लागू रहेंगे।
  45. प्रकृति और जीवनदवा देनादुष्प्रभावों के जोखिम की पर्याप्त जानकारी दिए बिना रोगी को दवा देना कभी नहीं होना चाहिए।
  46. संस्कृति और कलापूर्व (एशिया)सादगी में समृद्धि देखना — यही वह पूर्वी सौंदर्य-बोध है जो वाबी-साबी से जुड़ता है।
  47. समाज और सामयिक विषयआगमनयह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि लैंगिक समानता के बिना सचमुच समृद्ध समाज कभी नहीं बन सकता।
  48. संस्कृति और कलापंजीकरणविश्व धरोहर में दर्ज होने से उसके ऐतिहासिक महत्व को दुनिया ने एक बार फिर स्वीकार किया।
  49. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावदूरजब भी अपने दूर बसे वतन की याद आती है, सीने में मीठी-सी टीस उठती है।
  50. उन्नत व्यावसायिकगुज़ारना; पार करानामैदान से हम यह प्रस्ताव पास कराना चाहते हैं, पर असली कुंजी यह है कि हस्ताक्षर का अधिकार रखने वाले महाप्रबंधक को कैसे राज़ी करें।
  51. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशघुमावदार रास्तातात्कालिक दक्षता के मोह में पड़े बिना, "जल्दी का काम शैतान का" मानकर हमने जान-बूझकर लंबा जाँच-मार्ग चुना।
  52. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावतुक होना; गुज़रनाजिस दुकान में मैं बरसों से जाता रहा, वह बंद होने वाली है — यह सुनकर मन में एक अजीब-सी उदासी भर आई।
  53. ज़ोर, सीमा और चरमशहर; महानगरइस इलाके का अपना जो सादा स्वाद है, वह शहर में कभी दोहराया नहीं जा सकता।
  54. वर्णन और अलंकारसमयमुख्य सड़क से हटकर बसा वह गाँव इतना चुप था मानो समय की धारा उसे पीछे छोड़ गई हो।
  55. समाज और सामयिक विषयकभी-कभीनियमों में हद से ज़्यादा ढील कभी-कभी उपभोक्ता संरक्षण की दृष्टि से समस्याएँ पैदा कर सकती है।
  56. शैक्षणिककभी-कभीसभी मूल्यों को सापेक्ष मानने वाला सापेक्षवाद कभी-कभी सोचना ही छोड़ देने की ग़ैर-ज़िम्मेदारी में बदल सकता है।
  57. जीवन और मूल्यकभी-कभीसामने वाले की भावना का ख्याल कर अपनी असली बात निगल जाना भी कभी-कभी दुनियादारी की ज़रूरी कला है।
  58. जीवन और मूल्यउपदेश देना; समझाना"शुरुआती संकल्प कभी मत भूलो"—यह ज़ेआमी के शब्द हैं, जिन्होंने कला-मार्ग की कठोरता समझाई।
  59. उन्नत व्यावसायिकबुद्धिमानी; अच्छी नीतिअब तक जो बातचीत गढ़ी गई है, उसे शून्य पर लौटाना दोनों पक्षों के लिए फ़ायदे का सौदा नहीं होगा।
  60. मूल्यांकन और अनिवार्यतापहचान; निर्धारणजब वजह ही पता न चले, तो कोई उपाय बनाने का रास्ता ही कहाँ बचता है?
  61. भाषा और मीडियागुमनामसूचना जितनी गुमनाम होकर फैलाई जाती है, उसकी ज़िम्मेदारी उतनी ही धुँधली पड़ती जाती है।
  62. भाषा और मीडियाविशिष्टबोली की अपनी खास कहन में ऐसी गरमाहट बसी होती है जिसे मानक भाषा में पूरी तरह उतारा ही नहीं जा सकता।
  63. वर्णन और अलंकारघड़ीविभागाध्यक्ष बार-बार घड़ी देख रहे थे, मानो कह रहे हों कि अब घर जाओ।
  64. ज़ोर, सीमा और चरमहल होना; खुलनाउसकी असाधारण प्रतिभा के बावजूद भी वह कठिन समस्या हल नहीं हो सकी।
  65. संयोजक और शर्तेंपर्वतारोहणमौसम सुधरे या न सुधरे, कल की चढ़ाई तय कार्यक्रम के मुताबिक होगी।
  66. समाज और सामयिक विषयशहर; नगरताज़ा आँकड़े शहर और ग्रामीण इलाकों के बीच की लगभग अपाट खाई को उजागर करते हैं।
  67. मूल्यांकन और अनिवार्यतावर्ष; समयइतने बरसों बाद, शायद वे ऐसे दो लोग थे जिनका मिलना नियति में लिखा ही था।
  68. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावखुद को बंद कर लेनाआहत आत्मसम्मान के कारण वह और भी ज़िद्दी होकर अपने खोल में सिमटती चली गई।
  69. प्रकृति और जीवनप्रगति पथ परतापन से निपटने के बहाने विकासशील देशों के विकास के अधिकार को एकतरफा सीमित करना तर्कसंगत नहीं है।
  70. ज़ोर, सीमा और चरमज़मीन; जगहअनजान जगह पर, जहाँ भाषा तक समझ नहीं आती थी, ऐसा असहाय लगा कि बयान करना मुश्किल है।
  71. संयोजक और शर्तेंबीच में; रास्ते मेंबात मैंने ही उठाई थी, इसलिए बीच में छोड़ देना मेरे लिए मुमकिन नहीं।
  72. मूल्यांकन और अनिवार्यताअचानकजिन कर्मचारियों को अचानक नौकरी से निकाले जाने की सूचना मिली, उनकी बेचैनी की कल्पना करना कठिन नहीं।
  73. संयोजक और शर्तेंबहुतइतनी-सी मुश्किल से ही अगर हौसला टूट जाए, तो तुम शीर्ष स्तर पर कभी नहीं टिक पाओगे।
  74. ज़ोर, सीमा और चरमतैयार होना; व्यवस्थित होनातैयारी पूरी तरह मुकम्मल है। अब बस नतीजे का इंतज़ार करना बाकी है।
  75. तर्क और वाद-विवादव्यवस्थित करनाव्यवस्थाएँ कितनी भी दुरुस्त कर लो, जब तक मानव-स्वभाव नहीं बदलता, भ्रष्टाचार नहीं मिटेगा।
  76. क़ानून और संस्थाएँसूचना; अधिसूचनाक़ानून में संशोधन के बाद जिन कारोबारों के लिए केवल सूचना देना काफ़ी था, उनमें से कुछ अब अनुमति-प्रणाली में आ गए।
  77. प्रकृति और जीवनसीमित रहनावनों का संरक्षण केवल दृश्य-सौंदर्य बनाए रखने तक सीमित नहीं; यह जलस्रोतों के पोषण और भूस्खलन की रोकथाम में भी योगदान देता है।
  78. वर्णन और अलंकारबनाए रखना; शेष रखनाबंद हो चुकी रेल-लाइन का वह स्टेशन जर्जर होकर भी कहीं न कहीं एक पुरानी-सी आत्मीयता बनाए हुए था।
  79. संयोजक और शर्तेंउठाना (आपत्ति); जपनाइस काग़ज़ पर एक बार दस्तख़त कर दिए, तो बाद में आपत्ति उठाने का हक़ बिलकुल नहीं रहेगा।
  80. मूल्यांकन और अनिवार्यताउड़ना (अफ़वाहें)ऐसे लांछन उड़ रहे थे जिन्हें सुनना भी असह्य था; बहस अब बहस रह ही नहीं गई थी।
  81. भाषा और मीडियाकूद पड़नाएक रात रखकर दोबारा पढ़ो तो सुधारने लायक जगहें एक के बाद एक आँखों में कूदने लगती हैं।
  82. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशउड़ना; अचानक आनाअचानक कोई सवाल आ जाए तो भी वह घबराई नहीं और मौके के मुताबिक चुस्त जवाब दे दिया।
  83. तर्क और वाद-विवादकम; अभावग्रस्तउस परिकल्पना को पुष्ट करने वाले प्रायोगिक आँकड़े कम हैं, इसलिए फ़िलहाल यह अनुमान से आगे नहीं जाती।
  84. वर्णन और अलंकाररुकनामानो समय ही ठहर गया हो, उस प्राचीन नगरी में बीते दिनों की झलक अब भी बची थी।
  85. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावमित्र (साहित्यिक)अगर एक भी ऐसा दोस्त हो जिससे खुलकर दिल की बात कही जा सके, तो ज़िंदगी इतनी बुरी भी नहीं।
  86. संयोजक और शर्तेंसाथ होना; जुड़ा होनाचाहे कितने भी तर्क गिना लो, अगर नतीजे साथ न हों तो कोई नहीं मानेगा।
  87. संयोजक और शर्तेंसाथ मिलकरहमने मुश्किल दौर साथ मिलकर पार किया, इसीलिए आज हमारे बीच इतना गहरा रिश्ता है।
  88. संस्कृति और कलाजलना (दीपक)जालीदार दरवाज़ों के पीछे जलती रोशनी वाली उस पुरानी गली में बीते दिनों की छटा आज भी बची है।
  89. तर्क और वाद-विवादसमझना; पकड़नाशब्दों को पकड़कर नुक्ताचीनी करना छोड़िए और मेरे तर्क की मूल बात का जवाब दीजिए।
  90. संयोजक और शर्तेंसमझना; पकड़नाउसमें चीज़ों को निराशावादी नज़रिए से देखने की प्रवृत्ति है।
  91. जीवन और मूल्यसमस्या; परेशानीजो लोग सोशल मीडिया पर उचित दूरी नहीं रख पाते, वे रिश्तों की उलझनों में ज़्यादा आसानी से फँस जाते हैं।
  92. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशमें जकड़ा होनातात्कालिक नतीजों के मोह में पड़े बिना, टिककर और गंभीरता से शोध में जुटने का रवैया अपेक्षित है।
  93. मूल्यांकन और अनिवार्यता(संपर्क) रखना; छीना-झपटी करनाइस स्तर की आलोचना का हर बार जवाब देने लायक कोई तुक नहीं।
  94. मूल्यांकन और अनिवार्यताउठाना; चर्चा करनाजिन अफ़वाहों का अब तक कोई पुख़्ता सबूत नहीं, उन्हें सार्वजनिक मंच पर उठाना ठीक नहीं।
  95. संयोजक और शर्तेंसुधार; वापसीअगर समयसीमा से ठीक पहले सिस्टम ठप हो गया, तो ऐसी हालत बनेगी जिसकी भरपाई नामुमकिन है।
  96. प्रकृति और जीवनप्रयास; पहलतटीय पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के प्रयास और मछुआरों की आजीविका की रक्षा—ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
  97. क़ानून और संस्थाएँरद्दीकरण; निरस्तीकरणबार-बार यातायात नियम तोड़ने के बाद आख़िरकार उसका लाइसेंस रद्द कर दिया गया।
  98. क़ानून और संस्थाएँरद्द करना; निरस्त करनानाबालिग द्वारा अकेले किया गया अनुबंध बाद में रद्द किया जा सकता है।
  99. तर्क और वाद-विवादछूट जाना; चूकनातर्क की संगति के पीछे भागते-भागते हमें वास्तविकता की जटिलता हाथ से नहीं जाने देनी चाहिए।
  100. तर्क और वाद-विवादगड़बड़ कर देना; उलझा देनावह प्रतिवाद निशाने पर लगा हो, ऐसा कहना कठिन है; लगता है असली मुद्दा ही ग़लत समझा गया है।
  101. क़ानून और संस्थाएँ(सहमति) प्राप्त करना; लगानासामने वाले पक्ष की सहमति हासिल करने के बाद ही हम आख़िरकार बातचीत की मेज़ पर बैठे।
  102. संयोजक और शर्तेंपीछे छोड़ देनाएक दिन भी ढिलाई बरती, तो इस तेज़ी से बदलते उद्योग में तुम पल भर में पीछे छूट जाओगे।
  103. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशलेन-देन; व्यापारतय तारीख़ का सख़्ती से पालन हो, इसके लिए पहले ही ग्राहक कंपनी को साफ़-साफ़ ताकीद कर देना ज़रूरी है।
  104. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशसंकलित करनासभी विभागों की राय को एक जगह लाना जितना सोचा था, उससे कहीं ज़्यादा मेहनत का काम निकला।
  105. समाज और सामयिक विषयवापस पानाजैसे ही माँग-आपूर्ति का तनाव घटेगा, दाम भी अपने आप शांत हो जाने चाहिए।
  106. वर्णन और अलंकारवापस पा सकनाजो भरोसा एक बार टूट गया, क्या उसे इतनी आसानी से वापस पाया जा सकता है?
  107. संयोजक और शर्तेंसंभालना (कमान)जब अध्यक्ष खुद मोर्चा संभाल रहे हों, तो कर्मचारियों को भी कमर कसनी ही पड़ेगी।
  108. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशदूर होना; निकल जानादोनों पक्षों की दलीलों के बीच फँसकर मध्यस्थ हिल तक नहीं पा रहा था।
  109. शैक्षणिकसमझौता (लेन-देन)सटीकता और प्रसंस्करण की गति अक्सर एक-दूसरे की क़ीमत पर आती हैं, और दोनों को साधना आसान नहीं।
  110. संयोजक और शर्तेंठप पड़ना; असफलताआगे चाहे कैसी भी मुश्किलें खड़ी हों, हम इस योजना को अधूरा नहीं छोड़ सकते।
  111. वर्णन और अलंकारमिट्टीबारिश के बाद मंदिर-प्रांगण में काई और मिट्टी की हल्की गंध तैर रही थी।
  112. जीवन और मूल्यमात्रा; सीमाहद से ज़्यादा परवाह उल्टे सामने वाले को ही हमारा ख्याल रखने पर मजबूर कर देती है।
  113. ज़ोर, सीमा और चरमसहमतिउसकी ख़ामोशी और कुछ नहीं, मौन सहमति ही थी।
  114. उन्नत केइगो और औपचारिकताया नहींपता नहीं आपको पसंद आएगा या नहीं, पर कृपया ग्रहण कीजिए।
  115. भाषा और मीडियासमानार्थी"wabiru" और "ayamaru" (दोनों का अर्थ क्षमा माँगना) देखने में समान लगते हैं, पर औपचारिक अवसरों पर उनके भाव का अंतर मायने रखता है।
  116. भाषा और मीडियारुझानजनमत की दिशा गलत आँक ली गई, तो नीति की वैधता ही डगमगा सकती है।
  117. तर्क और वाद-विवादकिसी भी तरहमान्यता से निष्कर्ष तक की छलाँग इतनी बड़ी है कि सुनने वाला किसी भी तरह साथ नहीं चल पाता।
  118. मूल्यांकन और अनिवार्यताउक्त कंपनीनकदी प्रवाह बिगड़ने के कारण कंपनी को अपने मुख्य कारोबार से हटने पर मजबूर होना पड़ा।
  119. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशएक ही समय मेंपढ़ाई और कारोबार दोनों एक साथ साधने चला, और दो नावों पर पैर रखने वाले की तरह दोनों बीच में ही अटक गए।
  120. मूल्यांकन और अनिवार्यतासहानुभूतियुद्ध की आग से घर छोड़ने को मजबूर लोगों की तस्वीर मन में ऐसी करुणा जगाती है जिसे रोक पाना कठिन है।
  121. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशविचलित होनाअचानक कोई सवाल आ जाए तो भी वह घबराई नहीं और मौके के मुताबिक चुस्त जवाब दे दिया।
  122. संयोजक और शर्तेंसाथ उपस्थित होनाबॉस बैठक में मौजूद हों या न हों, कार्यवृत्त हमेशा सभी के साथ साझा किया जाता है।
  123. उन्नत केइगो और औपचारिकताकृपया; लीजिएयह स्मृति-चिह्न कृपया जाते समय अपने साथ ले जाइएगा।
  124. मूल्यांकन और अनिवार्यताभव्य; गरिमामयअपने देश के प्रतिनिधि के रूप में उसने ऐसा गरिमामय रवैया बनाए रखा जिस पर शर्मिंदगी की कोई बात नहीं।
  125. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावकिसी भी तरह; सचमुचमाँ-बाप से झूठ बोलकर घर छोड़ना मुझे अंदर ही अंदर बेहद कचोटता रहा।
  126. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशशुरुआत; प्रवेशघर से काम की व्यवस्था ने आने-जाने का बोझ भी घटाया और उत्पादकता भी बढ़ाई — सचमुच एक पंथ दो काज।
  127. उन्नत केइगो और औपचारिकतासंलग्न (पत्र में)विस्तृत जानकारी के लिए कृपया संलग्न दस्तावेज़ देखकर इस पर विचार करें, तो हमें प्रसन्नता होगी।
  128. संयोजक और शर्तेंगठबंधनआपसी भरोसे के बिना कोई भी गठबंधन लंबे समय तक नहीं टिकता।
  129. जीवन और मूल्यबहुत; धन्यवादबहुत पहले से ही उससे मेरी नहीं पटती; एक ही मेज़ पर बैठे रहने भर से मन थक जाता है।
  130. ज़ोर, सीमा और चरमअशांति; विचलनयह तो वही प्रतिक्रिया थी जिसका अंदाज़ा पहले से था, हर बार घबराने की ज़रूरत नहीं।
  131. उन्नत केइगो और औपचारिकतासमान; उसी प्रकारमुझे ज्ञात हुआ कि आप सब स्वस्थ हैं — इससे बड़ी प्रसन्नता की बात और क्या हो सकती है।
  132. ज़ोर, सीमा और चरमसहकर्मीबरसों का साथी सहकर्मी चल बसा — यह अकेलापन शब्दों में नहीं समाता।
  133. संयोजक और शर्तेंसड़कलंबी छुट्टी का आख़िरी दिन था, इसलिए हाईवे पर जगह-जगह भारी जाम लग गया।
  134. भाषा और मीडियापढ़ने के बादछोटे निबंध में भी चारों चरण सुव्यवस्थित हों, तो पढ़ने के बाद का प्रभाव कहीं अधिक कसा हुआ लगता है।
  135. वर्णन और अलंकारतानाशाहीवह तानाशाह ख़ुद को भगवान की तरह पेश करता था और उसी अंदाज़ में जनता पर राज करता था।
  136. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावपाठककहानी अपना अंत नहीं दिखाती, उसे पाठक की कल्पना पर छोड़ देती है — और इसीलिए गहरी गूँज छोड़ जाती है।
  137. क़ानून और संस्थाएँएकाधिकारवह कृत्य एकाधिकार-निरोधक क़ानून का उल्लंघन करता है या नहीं, यही सुनवाई का सबसे बड़ा विवाद-बिंदु बना।
  138. ज़ोर, सीमा और चरममौलिकताभाषा भले ही कच्ची हो, पर इस शोध-पत्र में एक मौलिक सोच चमकती है।
  139. संस्कृति और कलाअनोखा; विशिष्टइलाक़े के हिसाब से आज भी ऐसी जगहें हैं जहाँ दुल्हन के विवाह से जुड़ी अनोखी रीतियाँ बची हुई हैं।
  140. ज़ोर, सीमा और चरमस्वतंत्रता; स्वतंत्र होनाजब से मैंने अपना काम शुरू किया है, दिन-रात बिना रुके काम ही काम चल रहा है।
  141. प्रकृति और जीवनमिट्टीजिस पुराने स्थल पर मिट्टी का प्रदूषण पाया गया, उसकी सफाई में भारी खर्च लगता था, इसलिए वह लंबे समय तक यूँ ही पड़ा रहा।
  142. तर्क और वाद-विवादकौन सा; कहाँजब कारण और परिणाम चक्र बना लें, तो कौन पहले है यह कहा नहीं जा सकता, और सीधा-सादा कारण-चित्र काम नहीं आता।
  143. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशकौन सा; कितनाहर विभाग बजट हथियाने के लिए अपने ही फ़ायदे की दलीलें गढ़ता है, इसलिए समग्र हित की बहस आगे बढ़ ही नहीं पाती।
  144. संयोजक और शर्तेंप्रयास; मेहनतइस नाज़ुक बातचीत में अगर एक भी बात ग़लत मुँह से निकल गई, तो अब तक की सारी मेहनत पानी में मिल जाएगी।
  145. संयोजक और शर्तेंकौन साअब चाहे जितनी भी जल्दी कर लें, इस मुकाम पर समयसीमा पूरी होने की कोई उम्मीद नहीं बची।
  146. संयोजक और शर्तेंकितना भीचाहे कितनी ही आलोचना झेलनी पड़ी हो, उसने अपनी शोध-दिशा कभी नहीं बदली।
  147. संयोजक और शर्तेंकिस तरह का; कैसाचाहे कितना ही बड़ा विशेषज्ञ क्यों न हो, भविष्य को पूरी तरह ठीक-ठीक बताना किसी के बस की बात नहीं।
  148. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशचाहे कितना भीचाहे कितना ही बेतुका छोटा-मोटा काम हो, वरिष्ठ ने समझाया — सब्र का फल मीठा होता है, टिके रहोगे तो एक दिन ज़रूर मिलेगा।
  149. शैक्षणिकनामयह मत भी है कि इतिहास को नायक नहीं, बल्कि गुमनाम लोग ही असल में चलाते हैं।
  150. समाज और सामयिक विषयअंदर-बाहर; देश-विदेशप्रधानमंत्री की एक के बाद एक बेतुकी टिप्पणियाँ देश-विदेश में बड़ी हलचल मचा रही हैं।
  151. संयोजक और शर्तेंमन ही मनमन ही मन झिझकते हुए भी उसने हिम्मत करके बैठक में अपने दिल की बात कह डाली।
  152. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावआंतरिकभेद खोलने में हिचकते कर्मचारी के मन में न्याय-भावना और आत्मरक्षा का द्वंद्व चल रहा था।
  153. ज़ोर, सीमा और चरमविषय-वस्तु; सामग्रीवह नेता, चाहे बोलने का वक़्त देखें या बात का मज़मून, बस जनता की नसों पर चढ़ता रहता है।
  154. मूल्यांकन और अनिवार्यताअब भी; इसके अलावाआधी सदी बाद भी यह पढ़ने लायक इसलिए है, क्योंकि यह सचमुच सार्वभौमिक विषय को छूती है।
  155. भाषा और मीडियाठीक करना; सुधारनाजब तक समूची संरचना दोबारा न गढ़ी जाए, ब्योरों को कितना भी सुधार लो, लेख कसा हुआ नहीं बनेगा।
  156. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशफिर भी; अब भीचाहे बिखरा पानी लौटता न हो, फिर भी वह बीते गौरव से चिपका रहा और टूटे रिश्ते को जोड़ने की उम्मीद नहीं छोड़ पाया।
  157. जीवन और मूल्यसंबंध; रिश्ताइतना पराया मत बन यार, हम दोनों का याराना कोई आज का है क्या?
  158. जीवन और मूल्यआसानी से (नहीं); काफ़ीबॉस और अधीनस्थ के रिश्ते में मन की बात खोलकर कहना काफी मुश्किल होता है।
  159. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावआधा; अंशतःबुढ़ापे में उसकी ज़िद और बढ़ती जा रही है, और परिवार आधा हार मानकर उसे देखता रहता है।
  160. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशअंदर की चीज़; सामग्रीबस दिखावे की फ़िक्र करना और असली सार को अनदेखा कर देना — यह तो सिरे से उलटी बात है।
  161. ज़ोर, सीमा और चरमलंबालंबे इतिहास वाले विश्वविद्यालय की ही अपनी वह खुली, मुक्त शैक्षणिक हवा यहाँ बहती है।
  162. मूल्यांकन और अनिवार्यताबहा देना; बह जानापल भर की भावना में बहकर की गई उसकी बातें और हरकतें भरोसे के लायक कतई नहीं हैं।
  163. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशभुला पाना; बहा पानाएक बार जो अपमान मुँह से निकल गया, उसे यूँ आसानी से भुलाया नहीं जा सकता।
  164. ज़ोर, सीमा और चरमकई साल; लंबे समयउसकी बरसों की मेहनत देखते हुए, उसे पुरस्कार मिलने पर हैरान होने की कोई बात नहीं।
  165. समाज और सामयिक विषयलंबा खिंचनाजब तक लंबी अपस्फीति से बाहर नहीं निकलते, असली आर्थिक सुधार की उम्मीद बेमानी है।
  166. वर्णन और अलंकारप्रवाह; धारामुख्य सड़क से हटकर बसा वह गाँव इतना चुप था मानो समय की धारा उसे पीछे छोड़ गई हो।
  167. उन्नत व्यावसायिकबह जाना; बहनाजब बहस भावनाओं में बहने लगी, तो उसने माहौल संभालकर शांत भाव से मुद्दों को फिर से व्यवस्थित कर दिया।
  168. जीवन और मूल्यस्वर्गीयकिसी की माँगी मदद को कभी मना न करना—यही मेरे स्वर्गीय गुरु का सिद्धांत था।
  169. संयोजक और शर्तेंछोड़ देना; त्याग देनाबात मैंने ही उठाई थी, इसलिए बीच में छोड़ देना मेरे लिए मुमकिन नहीं।
  170. वर्णन और अलंकारलगना; प्रतीत होनारात की नीरवता में बस सड़क के खंभे ही अकेले, बेसहारे-से खड़े रह गए थे।
  171. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावबिछड़ने का दुःख; अवशेषबीतते मौसम को अलविदा कहती हुई-सी वह खिड़की के बाहर उदास मन से देखती रही।
  172. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावबिछड़ने का दुःखविदेश में पढ़ाई की आख़िरी रात इतनी भारी लगी कि मुझे ठीक से नींद ही नहीं आई।
  173. उन्नत केइगो और औपचारिकताकरना (आदरसूचक)आप कृपया अपने विवेक से जैसा उचित समझें, वैसा कीजिए।
  174. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशपूरा करना; हासिल करनापढ़ाई और कारोबार दोनों एक साथ साधने चला, और दो नावों पर पैर रखने वाले की तरह दोनों बीच में ही अटक गए।
  175. मूल्यांकन और अनिवार्यताबनाना; रूप लेनाऐसे लांछन उड़ रहे थे जिन्हें सुनना भी असह्य था; बहस अब बहस रह ही नहीं गई थी।
  176. संयोजक और शर्तेंहासिल करनामैदान में जुटे लोगों की लगातार मेहनत के बिना यह तकनीकी क्रांति कभी संभव न होती।
  177. संयोजक और शर्तेंसंतुष्टि; स्वीकारसंबंधित व्यक्ति संतुष्ट हो या न हो, हस्ताक्षरित अनुबंध की वैधता पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
  178. वर्णन और अलंकारपुरानी यादें ताज़ा; याद दिलाने वालाबंद हो चुकी रेल-लाइन का वह स्टेशन जर्जर होकर भी कहीं न कहीं एक पुरानी-सी आत्मीयता बनाए हुए था।
  179. संयोजक और शर्तेंहर बात; कुछ भीउसकी आदत है कि हर बोझ अकेले ही उठा लेती है, इसी वजह से आस-पास के लोग चिंतित रहते हैं।
  180. वर्णन और अलंकारएक भी (नहीं)वह ऐसे बोल रही थी मानो हर तथ्य जानती हो, जबकि असल में उसे कुछ भी समझ नहीं था।
  181. उन्नत केइगो और औपचारिकतासबसे बढ़करमुझे ज्ञात हुआ कि आप सब स्वस्थ हैं — इससे बड़ी प्रसन्नता की बात और क्या हो सकती है।
  182. उन्नत केइगो और औपचारिकतानामक्षमा कीजिए, क्या आप कृपया इस अतिथि-पुस्तिका में अपना नाम लिख देंगे?
  183. ज़ोर, सीमा और चरमसीधा प्रसारणलाइव प्रसारण का ही अपना वह तनाव दर्शकों को स्क्रीन से चिपकाए रहा।
  184. समाज और सामयिक विषयलहरबुज़ुर्ग होती आबादी की लहर चिकित्सा-मोर्चे पर सीधे चोट कर रही है और कर्मचारियों की पुरानी कमी को और बढ़ा रही है।
  185. ज़ोर, सीमा और चरमपरेशान करनाकर्मचारियों की कमी से जूझना सिर्फ़ बुज़ुर्ग-देखभाल उद्योग तक सीमित नहीं है।
  186. जीवन और मूल्यचिंतासब कुछ अकेले ढोना—यह तो परायापन हुआ; परेशानी थी तो मुझसे कह देता ना।
  187. मूल्यांकन और अनिवार्यताक़तार में लगनासुबह जल्दी से कतार में लगना काम आया — मुझे वह पहला संस्करण मिल गया जो शायद ही कभी मिलता है।
  188. संयोजक और शर्तेंक़तार में रखना; सजानाचाहे कितने भी तर्क गिना लो, अगर नतीजे साथ न हों तो कोई नहीं मानेगा।
  189. संयोजक और शर्तेंसंभव होना; स्थापित होनाहम एक-दूसरे पर भरोसा करते हैं, तभी तो खुलकर, बेबाक बहस भी हो पाती है।
  190. वर्णन और अलंकारबन सकनामैं आपकी मदद नहीं कर पा रहा, इसका मुझे सचमुच गहरा खेद है, पर इस बार आपके प्रस्ताव को टालने के सिवा कोई रास्ता नहीं।
  191. संयोजक और शर्तेंआदत पड़नाबातचीत का अभ्यास होते हुए भी पहली बार मिले व्यक्ति के साथ दाँव-पेच में नसें तन ही जाती हैं।
  192. संयोजक और शर्तेंकठिन; दुर्बोधविशेषज्ञों में अक्सर बहस को ज़रूरत से ज़्यादा जटिल बना देने की प्रवृत्ति होती है।
  193. ज़ोर, सीमा और चरमकठिन परिस्थिति; संकटइस संकट से पार पाने वाला उसके सिवा और कोई नहीं है।
  194. संयोजक और शर्तेंकठिनाई; बाधामुझे लगा था कि बातचीत उलझ जाएगी, पर हैरानी की बात है कि हम आसानी से सहमति पर पहुँच गए।
  195. ज़ोर, सीमा और चरमकठिन समस्याउसकी असाधारण प्रतिभा के बावजूद भी वह कठिन समस्या हल नहीं हो सकी।
  196. शैक्षणिककमी; कठिनाईयह पूर्वानुमान-मॉडल सटीक तो बहुत है, पर इसकी दिक़्क़त यह है कि नतीजों की व्याख्या इंसान के लिए कठिन है।
  197. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावअवर्णनीय रूप से; बिल्कुलजिस दुकान में मैं बरसों से जाता रहा, वह बंद होने वाली है — यह सुनकर मन में एक अजीब-सी उदासी भर आई।
  198. संस्कृति और कलाअवर्णनीय रूप सेसाँझ की घंटी की आवाज़ में एक अवर्णनीय भावपूर्ण छटा तैर रही थी।
  199. वर्णन और अलंकारकिसी भी प्रकार (नहीं)इस मामले में हमारी कंपनी की कोई भी क़ानूनी ज़िम्मेदारी नहीं बनती।
  200. संयोजक और शर्तेंकिसी प्रकार काऔपचारिक माफ़ी न सही, पर किसी न किसी तरह की सफ़ाई तो मिलनी ही चाहिए।
  201. वर्णन और अलंकारगंधबारिश के बाद मंदिर-प्रांगण में काई और मिट्टी की हल्की गंध तैर रही थी।
  202. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावकमज़ोर (किसी काम में)अनकही बात भाँपने में मैं कच्चा हूँ, इसलिए अक्सर माहौल पढ़ने में चूक जाता हूँ।
  203. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावपकड़ना; थामनाजो नेता सत्ता मिलते ही घमंडी हो जाए, उसे जनमत जल्द ही ठुकरा देगा।
  204. संस्कृति और कलाचहल-पहलपुराने पड़ाव-नगर की रौनक आज केवल राजमार्ग के किनारे खड़े पुराने घरों की कतारों में अवशेष के रूप में बची है।
  205. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशभागनानिकासी के आदेश बार-बार बदलते रहे, इसलिए लोग बस इधर-उधर भागते रहे और कुछ तो समय पर निकल ही नहीं पाए।
  206. शैक्षणिकद्वैतवादकर्ता और वस्तु के द्वैत को पार करने की कोशिश ही घटनाविज्ञान का प्रस्थान-बिंदु थी।
  207. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावगोलमोल करना; गंदा करनाचयन के नतीजे के बारे में ज़िम्मेदार अधिकारी गोल-मोल बोलता रहा और आख़िर तक अनकहे संकेतों वाला रवैया बनाए रखा।
  208. प्रकृति और जीवनकार्बन डाइऑक्साइडकार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन के अनुपात में कर लगाने की व्यवस्था कंपनियों का व्यवहार बदलने का सशक्त प्रोत्साहन बन सकती है।
  209. जीवन और मूल्यझलकनाउसके शब्दों में वह जीवन-दृष्टि झलकती है जो अनगिनत कष्ट पार कर चुके व्यक्ति की ही हो सकती है।
  210. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावझलकना; रिसनाउसका पत्र संयत लहजे में है, फिर भी पंक्तियों के बीच रिसते अकेलेपन को पढ़े बिना नहीं रहा जाता।
  211. वर्णन और अलंकारधुंधलाना; झलकनाबिछड़ते वक़्त उसके चेहरे की बग़ल-झलक में एक हल्की-सी उदासी छलक रही थी।
  212. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावडायरीजिसने छोटा बच्चा छोड़कर दुनिया छोड़ी, उसकी डायरी पढ़कर मन बेतरह भर आया।
  213. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावजापानजापानी समाज में मन की बात और दिखावटी शिष्टाचार के बीच का यह भेद विदेशियों को ख़ास तौर पर उलझाऊ लगता है।
  214. संस्कृति और कलाजापानी (व्यक्ति)उसकी कृतियों में वह विशिष्ट जापानी सौंदर्य-बोध धड़कता है जो सब फ़ालतू को छाँट देता है।
  215. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशदो खरगोशजैसा कहा जाता है, दो नावों पर पैर रखने वाला डूबता है — जो योजना सब कुछ समेटना चाहती थी, वह हर मोर्चे पर अधूरी रह गई।
  216. संयोजक और शर्तेंफिर कभी (नहीं)उस आदमी को एक बार पैसे उधार दे दिए, तो मान लेना कि वे फिर कभी वापस नहीं आएँगे।
  217. समाज और सामयिक विषयवाहक; कर्ता-धर्ताजहाँ एक ओर महानगर में केंद्रीकरण बढ़ रहा है, वहीं ग्रामीण इलाके काम संभालने वालों की कमी से हाँफ रहे हैं।
  218. समाज और सामयिक विषयवहन करना; ज़िम्मा लेनादेखभाल का भार उठाने वाले परिजनों का अकेलापन अब ऐसी समस्या माना जाने लगा है जिसे पूरे समाज को थामना चाहिए।
  219. भाषा और मीडियाजापानी भाषाजापानी की गोल-मोल अभिव्यक्तियाँ इनकार को नरम बनाने वाला स्नेहक हैं, और साथ ही विदेशियों के लिए एक दुर्बोध दीवार भी।
  220. संस्कृति और कलाबारीकी; सूक्ष्म अंतरउसकी समीक्षा में ऐसी पैनी दृष्टि है जो किसी कृति में छिपी सूक्ष्म बारीकियों को कभी नहीं चूकती।
  221. उन्नत व्यावसायिकसावधानीपूर्ण; सूक्ष्मसंबंधित लोगों के साथ पहले से किए गए सावधान तालमेल की बदौलत बैठक सुचारु रूप से चली।
  222. संस्कृति और कलाबगीचा; आँगनबिना पानी के भी जल-प्रवाह का आभास कराने वाला वह शुष्क बाग़ अत्यंत सूक्ष्म अभिव्यक्ति है।
  223. मूल्यांकन और अनिवार्यताअनुमोदन; स्वीकृतिबरसों की लगातार शोध रंग लाई; आख़िरकार नई दवा को मंज़ूरी मिल गई।
  224. ज़ोर, सीमा और चरममनुष्य; इंसानउसकी रचनाएँ इसीलिए बहुत सराही जाती हैं कि वे मानव अस्तित्व की जड़ों पर सवाल उठाना कभी बंद नहीं करतीं।
  225. शैक्षणिकसमझ; पहचानहमारी समझ पहले से ही भाषा नाम के ढाँचे द्वारा तय होती है।
  226. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावमानवीय भावनाकर्तव्य और भावना के बीच झूलते हुए उसे ऐसे अंतर्द्वंद्व से गुज़रना पड़ा जो कलेजा चीर देता था।
  227. संस्कृति और कलासंज्ञान; पहचानविश्व धरोहर में दर्ज होने से उसके ऐतिहासिक महत्व को दुनिया ने एक बार फिर स्वीकार किया।
  228. जीवन और मूल्यबिनानफा-नुकसान को किनारे रखकर भी सही राह पर चलने का उसका रवैया ही था जिसने चारों ओर का भरोसा जीता।
  229. भाषा और मीडियानिकालनाआगे-पीछे के संदर्भ को अनदेखा कर सिर्फ एक वाक्य निकाल लिया जाए, तो अर्थ आसानी से विकृत हो जाता है।
  230. संयोजक और शर्तेंकोताही करना; निकालनाएक दिन भी ढिलाई बरती, तो इस तेज़ी से बदलते उद्योग में तुम पल भर में पीछे छूट जाओगे।
  231. संस्कृति और कलाभीगनाबारिश से भीगी पत्थर की गली का आकर्षण और भी गहरा हो गया था।
  232. उन्नत केइगो और औपचारिकतास्वर; ध्वनि-गुणकल रात के संगीत-कार्यक्रम में मैंने उस महान कलाकार के परिपक्व स्वर को मनोयोग से सुना।
  233. भाषा और मीडियाकुछ समय छोड़ना; लिटानाएक रात रखकर दोबारा पढ़ो तो सुधारने लायक जगहें एक के बाद एक आँखों में कूदने लगती हैं।
  234. ज़ोर, सीमा और चरमकामना करना; चाहनादोनों देशों में जल्द से जल्द सुलह हो जाए — यही कामना सभी शोकाकुल परिवारों की गहरी, अटूट इच्छा है।
  235. भाषा और मीडियापरिश्रम की सराहना करना"otsukaresama" अभिवादन धीरे-धीरे इतने व्यापक प्रयोगों में रूढ़ हो गया—श्रम की सराहना से लेकर महज एक संकेत तक।
  236. वर्णन और अलंकारजड़ से; पूरी तरहउसका भाषण तूफ़ान जैसा था, जिसने श्रोताओं के मन को जड़ से हिला दिया।
  237. समाज और सामयिक विषयइंटरनेटरोज़गार में गतिशीलता बढ़ाने के साथ-साथ श्रमिकों के लिए सुरक्षा-कवच तैयार करना भी अत्यावश्यक है।
  238. वर्णन और अलंकारबुख़ार; गर्मीजनसमूह मानो बुख़ार में तपते हुए निराधार अफ़वाहों के पीछे बहता चला गया।
  239. उन्नत व्यावसायिकजड़ें जमानाप्रगति-निगरानी का औज़ार लगा भी लें, तो रिपोर्टिंग की संस्कृति न बने तो वह सिर्फ़ धरा रह जाएगा।
  240. क़ानून और संस्थाएँजड़ जमाए; गहरामूल्यांकन के मानदंड सार्वजनिक करने की माँग लगातार उठती है, पर प्राधिकरण निष्पक्षता का हवाला देकर उन्हें गोपनीय रखे हुए है।
  241. संयोजक और शर्तेंदृढ़; लगनशीलअनुभव भले ही कम रहा हो, फिर भी उसने उस मुश्किल मामले को डटकर अंजाम तक पहुँचाया।
  242. उन्नत व्यावसायिकछूटछूट की दर को लेकर दोनों पक्ष ऐसे बीच के रास्ते पर आ टिके जिसे दोनों स्वीकार कर सके।
  243. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावपर्दे के पीछे की तैयारीबैठक में उसने जो कहा वह महज़ दिखावा था; उसकी असली मंशा पर्दे के पीछे की बातचीत में सामने आई।
  244. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशनिशाना बनाना; लक्ष्य रखनारातोंरात अमीर बनाने वाली निवेश-योजनाओं के बारे में मैंने साफ़ ताकीद कर दी — जल्दी का काम शैतान का; असली रास्ता तो धीरे-धीरे बचत करना है।
  245. उन्नत व्यावसायिकतैयार करना; निखारनाअंतिम प्रस्ताव मैदान की माँगों और प्रबंधन की नीति को बारीकी से मिलाकर तैयार किया गया है।
  246. भाषा और मीडियाफिर से तैयार करनाजब तक समूची संरचना दोबारा न गढ़ी जाए, ब्योरों को कितना भी सुधार लो, लेख कसा हुआ नहीं बनेगा।
  247. ज़ोर, सीमा और चरमसावधानी; एहतियातइतनी बार ताकीद करने के बाद भी बात नहीं पहुँची — यह जानकर मन बिलकुल बैठ जाता है।
  248. शैक्षणिकउम्र; आयुप्रतिगमन विश्लेषण से आयु और संतुष्टि के बीच सार्थक ऋणात्मक सहसंबंध पाया गया।
  249. शैक्षणिकशोर; नॉइज़अगर सीमा ग़लत तय हो गई, तो असली संकेतों को भी शोर समझकर काट देने का ख़तरा है।
  250. उन्नत केइगो और औपचारिकताडिलीवरी की तारीख़दूसरे पक्ष से मुझे ज्ञात हुआ है कि वे सुपुर्दगी की तारीख़ एक सप्ताह पहले करना चाहते हैं।
  251. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावप्रबल; प्रगाढ़जैसे ही हार लगभग तय दिखी, उसने बड़ी सहजता से तुरंत अपनी ग़लती मान ली।
  252. क़ानून और संस्थाएँकर भुगतानकर चुकाना नागरिकों के तीन प्रमुख कर्तव्यों में से एक के रूप में संविधान में स्पष्ट लिखा है।
  253. प्रकृति और जीवनमन-मस्तिष्कउस दिन का भयावह दृश्य बीस साल बीत जाने के बाद भी पीड़ितों के मन में जस का तस अंकित है।
  254. ज़ोर, सीमा और चरमक्षमताएक बार की नाकामी के आधार पर उसकी पूरी काबिलियत को नकारना ठीक नहीं।
  255. वर्णन और अलंकारचूकना; गंवानापत्रकारों ने माइक इस तरह आगे बढ़ाए मानो एक भी शब्द छूटने न देने की ठान ली हो।
  256. वर्णन और अलंकारबचना; भागनावर्ष बेरहमी से इंसान को आगे धकेलते जाते हैं, और उनकी इस चाल से कोई नहीं बच सकता।
  257. समाज और सामयिक विषयसभी एक साथअर्थव्यवस्था का भविष्य अनिश्चित होने के कारण कंपनियाँ पूँजी-निवेश से हाथ खींच रही हैं।
  258. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावछोड़ना; रखनाजिसने छोटा बच्चा छोड़कर दुनिया छोड़ी, उसकी डायरी पढ़कर मन बेतरह भर आया।
  259. उन्नत व्यावसायिकबचना; बाक़ी रहनाअधिकार सौंपते हुए भी यह सिद्धांत नहीं भूलना चाहिए कि नतीजों की अंतिम जवाबदेही सौंपने वाले पर ही रहती है।
  260. ज़ोर, सीमा और चरमनिहारना; चाहनाचोटी से दिखने वाले बादलों के समंदर की ख़ूबसूरती बयान से बाहर थी।
  261. ज़ोर, सीमा और चरमउपस्थित होना; सामना करनाबिना पूरी तैयारी के उतरने का नतीजा यह फ़ज़ीहत हुई — इस पर मुझे गहरी शर्मिंदगी है।
  262. उन्नत केइगो और औपचारिकताटालना; बढ़ानामुझे अत्यंत संकोच है, पर क्या आप समयसीमा दो-तीन दिन बढ़ा सकेंगे?
  263. तर्क और वाद-विवादकहना; बयान करनानिष्कर्ष कहने से पहले उसे पुष्ट करने वाले आधार एक-एक करके ध्यान से रखना ज़रूरी है।
  264. जीवन और मूल्यनिगल जानासामने वाले की भावना का ख्याल कर अपनी असली बात निगल जाना भी कभी-कभी दुनियादारी की ज़रूरी कला है।
  265. वर्णन और अलंकार(शर्तें) मानना; पीनाइन शर्तों को मान लेना हमारी कंपनी की स्वायत्तता छोड़ देने के बराबर होगा।
  266. संस्कृति और कलापीनादावत में ज़रूरत से ज़्यादा न पीना — यह भी एक वयस्क के अच्छे संस्कारों की पहचान है।
  267. वर्णन और अलंकारफंस जाना (चट्टान पर)बातचीत चट्टान से टकरा गई, मानो हम ऐसे भूलभुलैया में भटक रहे हों जिसका निकास ही न दिखे।
  268. संयोजक और शर्तेंपार पाना; उबरनाहमने मुश्किल दौर साथ मिलकर पार किया, इसीलिए आज हमारे बीच इतना गहरा रिश्ता है।
  269. भाषा और मीडियाछपना; दर्ज होनाइस शब्द में ऐसा अर्थ छिपा है जो शब्दकोश में नहीं मिलता; माहौल भाँपे बिना असली मंशा गलत समझी जा सकती है।
  270. उन्नत व्यावसायिकसमझ; पकड़मैदान की देखरेख करने के पद पर होते हुए भी प्रगति की जानकारी न रखना — ऐसे में प्रबंधन की चूक का दोष लगे तो कोई अचरज नहीं।
  271. वर्णन और अलंकारपरित्यक्त; बंदबंद हो चुकी रेल-लाइन का वह स्टेशन जर्जर होकर भी कहीं न कहीं एक पुरानी-सी आत्मीयता बनाए हुए था।
  272. मूल्यांकन और अनिवार्यताहार का कारणसामने वाले को डरने लायक नहीं समझकर हल्के में लेना ही हार की वजह बनी।
  273. प्रकृति और जीवननिपटान; परित्यागजब तक कचरे को संसाधन के रूप में फिर से चक्र में लौटाने की व्यवस्था नहीं बनती, तब तक अत्यधिक उपभोग वाला समाज गतिरोध में फँस जाएगा।
  274. वर्णन और अलंकारपृष्ठभूमिगहरे नीले समुद्र की पृष्ठभूमि में लाइटहाउस का सफ़ेद रंग ख़ास तौर पर उभरकर नज़र खींच रहा था।
  275. उन्नत केइगो और औपचारिकतादेखना (विनम्र)संलग्न तस्वीर मैंने देख ली है। उसमें उन दिनों की झलक बख़ूबी उतर आई है।
  276. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशमिश्रण; अनुपातसबसे उपयुक्त मिश्रण तक पहुँचने के लिए धीरज भरे प्रयोग और असफलताओं का सिलसिला ज़रूरी था।
  277. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशबेकार सामग्रीबचे हुए माल से फ़र्नीचर बनाओ तो कचरा भी घटेगा और खर्च भी बचेगा — क्या यह एक पंथ दो काज नहीं?
  278. उन्नत केइगो और औपचारिकताउधार लेना (विनम्र)आपके बहुमूल्य दस्तावेज़ मैंने उधार लिए हैं, इसलिए अगले सप्ताह तक अवश्य लौटा दूँगा।
  279. प्रकृति और जीवनउत्सर्जनवैश्विक तापन की रफ्तार रोकने के लिए हर देश को उत्सर्जन कटौती के लक्ष्य काफी पहले खिसकाने होंगे।
  280. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावहार के आसारजैसे ही हार लगभग तय दिखी, उसने बड़ी सहजता से तुरंत अपनी ग़लती मान ली।
  281. तर्क और वाद-विवादहटाना; बाहर करनाभावनात्मक दलीलें छोड़कर कृपया तर्क की कड़ी जोड़ते हुए ही मेरा प्रतिवाद कीजिए।
  282. प्रकृति और जीवनअपशिष्ट जलऔद्योगिक अपशिष्ट जल के बेरोकटोक बहाव ने निचले प्रवाह क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र को जड़ से नष्ट कर दिया।
  283. संस्कृति और कलाव्यवस्थित करना; रखनाख़ाली स्थान से डरे बिना उसे साहसपूर्वक बरतना — यह कला केवल मँजे हुए सुलेखक को ही सधती है।
  284. उन्नत केइगो और औपचारिकतासुनना (विनम्र)अध्यक्ष महोदय की गूढ़ार्थपूर्ण बातें सुनकर मुझे लगता है कि मेरा दृष्टिकोण बहुत विस्तृत हो गया है।
  285. उन्नत केइगो और औपचारिकतापढ़ना (विनम्र)आपका शोध-पत्र पढ़कर मैं उसकी सूक्ष्म तर्क-प्रणाली से गहराई से प्रभावित हुआ।
  286. तर्क और वाद-विवादबंटवारा; आवंटनयह संदेह उभरा है कि बजट का बँटवारा कुछ लोगों की मर्ज़ी से मनमाने ढंग से तय हो रहा है।
  287. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावहार; पराजयहार को गरिमा के साथ स्वीकार करने के ढंग में ही असली शालीनता झलकती है।
  288. समाज और सामयिक विषयध्यान; लिहाज़कर-व्यवस्था में सुधार करते समय कम आय वाले वर्ग का ध्यान रखना अनिवार्य है।
  289. मूल्यांकन और अनिवार्यताघुसना; प्रवेश करनासुबह जल्दी से कतार में लगना काम आया — मुझे वह पहला संस्करण मिल गया जो शायद ही कभी मिलता है।
  290. उन्नत केइगो और औपचारिकतागौरव; सम्मानइतना गौरवशाली पुरस्कार पाकर मैं अत्यंत भावविह्वल हूँ।
  291. वर्णन और अलंकारविनाशपर्यावरण को हुई तबाही बेहद गंभीर है, और कहा जाता है कि पारिस्थितिकी तंत्र को उबरने में दशकों लगेंगे।
  292. उन्नत व्यावसायिकप्रयास करना; लक्ष्य रखनाजब हर विभाग की अपनी गणित उलझी हो, तो सहमति बनाने के लिए पहले टकराते हितों के बिंदु साफ़ करने ज़रूरी हैं।
  293. जीवन और मूल्यनापना; मापनाबॉस के साथ कितनी दूरी रखूँ, यह मैं तय नहीं कर पाता और कहाँ तक आगे बढ़ूँ, इसी में हमेशा नसें घिसती रहती हैं।
  294. शैक्षणिकमापना; अंदाज़ा लगानाजीन-संपादन तकनीक एक ओर अपार लाभ लाती है, दूसरी ओर उसमें गंभीर नैतिक समस्याएँ छिपी हैं।
  295. समाज और सामयिक विषयप्रभाव फैलना; असरमौद्रिक नीति का असर वास्तविक अर्थव्यवस्था तक पहुँचने में काफ़ी वक़्त लगता है।
  296. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशटूटन; विनाशचाहे बिखरा पानी लौटता न हो, फिर भी वह बीते गौरव से चिपका रहा और टूटे रिश्ते को जोड़ने की उम्मीद नहीं छोड़ पाया।
  297. जीवन और मूल्यकहना; उगलनाकमज़ोरी की बात न करना, चुप रहकर नतीजों से दिखा देना—यही उसका अपना खास सौंदर्यबोध था।
  298. उन्नत व्यावसायिककोरा कागज; शून्य सेअब तक जो बातचीत गढ़ी गई है, उसे शून्य पर लौटाना दोनों पक्षों के लिए फ़ायदे का सौदा नहीं होगा।
  299. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशएड़; तेज़ करनायह सर्वविदित है कि घटती जन्मदर ग्रामीण इलाकों की आबादी घटने की रफ़्तार बढ़ा रही है।
  300. वर्णन और अलंकारगरमागरम; तीव्रबहस ख़ूब गरमाई, पर निष्कर्ष बिलकुल साधारण-सा ही निकला।
  301. संस्कृति और कलापोषित करनाहेइआन दरबार में पली-बढ़ी वह परिष्कृत संस्कृति बाद के युगों की कला पर अपार प्रभाव छोड़ गई।
  302. ज़ोर, सीमा और चरमप्रेषण; अस्थायी कर्मचारीचाहे स्थायी कर्मचारी हों या ठेके पर रखे गए, जब काम एक ही है तो सुविधाओं में फ़र्क नहीं होना चाहिए।
  303. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावतीव्र; प्रचंडनौकरी बदलूँ या नहीं — मेरे भीतर ज़बरदस्त उधेड़बुन चल रही है।
  304. मूल्यांकन और अनिवार्यताहौसला बढ़ानावह एक बात सुनने में असह्य होना तो दूर, जीवन भर याद रहने वाला हौसला बन गई।
  305. क़ानून और संस्थाएँप्रगति; व्यवस्थासंशोधित क़ानून अगले वर्ष एक अप्रैल से लागू होगा।
  306. संयोजक और शर्तेंले जाना; ढोनारोज़ न सही, पर हफ़्ते में एक बार मैं ज़रूर मौके पर खुद जाने का ध्यान रखता हूँ।
  307. भाषा और मीडियाबीच में डालनाबीच-बीच में बहुत ज़्यादा उदाहरण डाल देने से तर्क की धारा दिखनी बंद हो जाती है, इसलिए सावधानी ज़रूरी है।
  308. क़ानून और संस्थाएँदरार; अंतरालजो लोग व्यवस्था की दरारों में गिर जाते हैं, उन्हें कैसे सहारा दिया जाए — यही सामाजिक सुरक्षा सुधार की सबसे बड़ी चुनौती है।
  309. संस्कृति और कलाचॉपस्टिकऔपचारिक जापानी भोज में इतने बारीक शिष्टाचार तय हैं कि चॉपस्टिक उठाने-रखने तक के नियम बने हैं।
  310. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावहर छोटी बात; कोने-कोनेउसकी बातों के हर सिरे पर साफ़ झलक रहा था कि उसने इस्तीफ़ा देने का मन बना लिया है।
  311. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशदौड़नाकहते हैं जल्दी का काम शैतान का — बुनियाद छोड़कर सीधे ऊँचे स्तर पर कूदने की क़ीमत बाद में ज़रूर चुकानी पड़ती है।
  312. संस्कृति और कलाशर्म; लज्जाअगर विवाह-अंत्येष्टि जैसे अवसरों के शिष्टाचार नहीं जानते, तो बड़े होकर शर्मिंदा होना पड़ सकता है।
  313. संस्कृति और कलाशुरुआत; छोरइस प्रथा के मूल तक जाएँ तो पता चलता है कि इसकी शुरुआत दरबारी शिष्टाचार से हुई थी।
  314. तर्क और वाद-विवादशुरू होनाजब मूल्यांकन ही सापेक्ष है, तो निरपेक्ष श्रेष्ठता पर बहस करने से कुछ हासिल नहीं।
  315. संयोजक और शर्तेंपहली बारपहली बार तो मिल नहीं रहे हो, फिर इतना घबराने की क्या ज़रूरत है।
  316. संयोजक और शर्तेंशुरू करनासब लोग आ भी गए हैं, तो क्या अब बैठक शुरू कर लें?
  317. मूल्यांकन और अनिवार्यतालज्जित होनाअपने देश के प्रतिनिधि के रूप में उसने ऐसा गरिमामय रवैया बनाए रखा जिस पर शर्मिंदगी की कोई बात नहीं।
  318. उन्नत केइगो और औपचारिकता(सीट) छोड़ना; हटानाजब विभागाध्यक्ष अपनी सीट पर नहीं थे, तभी एक अतिथि पधारे।
  319. वर्णन और अलंकारहट जाना; अलग होनामुख्य सड़क से हटकर बसा वह गाँव इतना चुप था मानो समय की धारा उसे पीछे छोड़ गई हो।
  320. वर्णन और अलंकारवास्तव में; सचमुचजिस समाज में ऐसा अन्याय बेरोक-टोक चलता हो, उसे भला कौन न्यायपूर्ण कह सकेगा?
  321. समाज और सामयिक विषयनिभाना; पूरा करनाटिकाऊ समाज का निर्माण वह राह है जिससे बचा नहीं जा सकता, अगर हमें आने वाली पीढ़ियों के प्रति अपना दायित्व निभाना है।
  322. मूल्यांकन और अनिवार्यताकाम; कार्यप्रदर्शनजिस समर्पण से वह काम करता है, वह प्रशंसा के योग्य है।
  323. ज़ोर, सीमा और चरमकाम करनाजब से मैंने अपना काम शुरू किया है, दिन-रात बिना रुके काम ही काम चल रहा है।
  324. जीवन और मूल्यकाम कर पानाऐसा कार्यस्थल बनाना जहाँ लोग गर्व से काम कर सकें—क्या यही प्रबंधक का असली दायित्व नहीं है?
  325. वर्णन और अलंकारत्वचानहाकर निकली उसकी त्वचा से साबुन की हल्की-सी महक उठ रही थी।
  326. उन्नत व्यावसायिकउजागर होना; भंडाफोड़जब नियम-उल्लंघन उजागर हो चुका है, तो प्रबंधन को जवाबदेही निभानी ही होगी।
  327. संस्कृति और कलाखुदाईउत्खनन के नतीजों ने उस प्रचलित मत को जड़ से पलट दिया, जिसे अब तक ऐतिहासिक तथ्य माना जाता था।
  328. प्रकृति और जीवनखोजशुरुआती लक्षण कम होने के कारण यह ऐसा रोग है जिसका पता प्रायः देर से चलता है।
  329. उन्नत व्यावसायिकबिखराव; भटकावबहस बिखरने लगती है, इसलिए पहले मुझे मुद्दों को तीन बिंदुओं में समेट लेने दीजिए, फिर आगे बढ़ें।
  330. प्रकृति और जीवनरोग का प्रकट होनाआनुवंशिक जाँच से रोग होने का जोखिम जान लेना ज़रूरी नहीं कि सुख की ओर ले जाए।
  331. भाषा और मीडियाप्रसारण; भेजनासूचना जितनी गुमनाम होकर फैलाई जाती है, उसकी ज़िम्मेदारी उतनी ही धुँधली पड़ती जाती है।
  332. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशघटना; उत्पत्तिअनुबंध पर दस्तख़त करने से पहले मैंने ज़ोर देकर पक्का कर लिया कि कोई अतिरिक्त खर्च नहीं आएगा।
  333. तर्क और वाद-विवादविचार; सोचजिन मान्यताओं को सामान्य समझ माना जाता है, उन पर एक बार संदेह करना ही मौलिक सोच की शुरुआत है।
  334. उन्नत केइगो और औपचारिकताप्रेषण; भेजनाआपने जो वस्तु ख़रीदी है, उसे हम आज ही रवाना कर देंगे।
  335. उन्नत व्यावसायिकऑर्डर देनाजैसे ही मंज़ूरी मिले, तुरंत ऑर्डर देने की प्रक्रिया शुरू हो सके — इसका इंतज़ाम पहले से कर रखिए।
  336. मूल्यांकन और अनिवार्यताविकासबार-बार होने वाले ये घोटाले प्रबंधन की जवाबदेही का सवाल खड़ा किए बिना नहीं रहेंगे।
  337. समाज और सामयिक विषयघोषणा; प्रस्तुतिबड़े बैंक द्वारा विलय की अचानक घोषणा से पूरे वित्तीय क्षेत्र में हलचल फैल रही है।
  338. ज़ोर, सीमा और चरमकथन; बयानवह नेता, चाहे बोलने का वक़्त देखें या बात का मज़मून, बस जनता की नसों पर चढ़ता रहता है।
  339. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावपहला प्यारयह जानकर कि अपने पहले प्यार से दोबारा कभी नहीं मिल पाऊँगा, बस एक मीठी-कसैली टीस बाकी रह गई।
  340. समाज और सामयिक विषयबिजली उत्पादनपरमाणु बिजलीघरों को दोबारा चालू करने के औचित्य पर जनता से राय माँगी जा रही है।
  341. प्रकृति और जीवनआदेश जारी करनायह डर कर कि निकासी की चेतावनी झूठी साबित होगी, अगर उसे जारी करने में हिचक हुई, तो ऐसी स्थिति बन सकती है जिसकी भरपाई न हो सके।
  342. संस्कृति और कलाभड़कीलाभले ही इसमें कोई चमक-दमक न हो, इस पात्र में एक गहरा, तृप्त करने वाला स्वाद महसूस होता है।
  343. समाज और सामयिक विषयरोक; लगामजब तक घटती जन्मदर और बढ़ती बुज़ुर्ग आबादी पर लगाम नहीं लगती, पेंशन व्यवस्था में आमूल बदलाव टाला नहीं जा सकेगा।
  344. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावबातचीत करनाबात यहाँ तक पहुँच गई है, तो जब तक हम एक बार खुलकर, दिल की बात न कर लें, यह खाई नहीं पटेगी।
  345. भाषा और मीडियाबोलने का तरीक़ाबेतहाशा विदेशी शब्द जड़ते जाने वाली बोली कभी-कभी सामग्री के खोखलेपन को ढकने वाला धुएँ का पर्दा भर होती है।
  346. संयोजक और शर्तेंबोलना; बात करनावह एक बार बोलना शुरू कर दे, तो इतना बोलती चली जाती है कि हामी भरने तक की गुंजाइश नहीं बचती।
  347. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावबोल सकनाअगर एक भी ऐसा दोस्त हो जिससे खुलकर दिल की बात कही जा सके, तो ज़िंदगी इतनी बुरी भी नहीं।
  348. वर्णन और अलंकारगुलदस्तासेवानिवृत्ति से ठीक पहले मिले फूलों के गुलदस्ते ने मेरे मन में कृतज्ञता और गहरी कर दी।
  349. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशछोड़ देना; मुक्त करनापल भर के आवेश में निकले शब्दों ने ऐसे नतीजे पैदा किए जो बिखरे पानी की तरह अपरिवर्तनीय थे — इसका पछतावा उसे जीवन भर रहा।
  350. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशअत्यधिक; घोरबस दिखावे की फ़िक्र करना और असली सार को अनदेखा कर देना — यह तो सिरे से उलटी बात है।
  351. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशशानदार; भव्य"सब्र का फल मीठा होता है" — यह ख़ुद से कहते हुए वह बिना किसी चमक-दमक वाले बुनियादी शोध में चुपचाप जुटी रही।
  352. वर्णन और अलंकारआतिशबाज़ीत्योहार की बची हुई गूँज की तरह, फुलझड़ी का धुआँ रात की हवा में लहराकर मिट गया।
  353. उन्नत केइगो और औपचारिकताचहक उठना; रौनक आनाविशिष्ट अतिथियों के एक के बाद एक पधारने से सभागार उल्लासपूर्ण वातावरण में डूब गया।
  354. संयोजक और शर्तेंदूर होना; अलग होनाअपने वतन से दूर रहने वाला होने के कारण, उसके मन में घर की याद औरों से कहीं ज़्यादा गहरी है।
  355. ज़ोर, सीमा और चरममाँपिता के गुज़र जाने के बाद से माँ बहुत ही कम बोलने लगी हैं।
  356. भाषा और मीडियाव्यापक"otsukaresama" अभिवादन धीरे-धीरे इतने व्यापक प्रयोगों में रूढ़ हो गया—श्रम की सराहना से लेकर महज एक संकेत तक।
  357. भाषा और मीडियामें डूब जाना; लत लगनाचार-चरणीय पारंपरिक ढाँचे का इतना ध्यान रखा कि लेख उल्टे साँचे में ढला और उबाऊ बन गया।
  358. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशदुर्दशा; (में पड़ना)अगर पहले से योजना ढीली-ढाली हो, तो असली मौके पर मैदान में अफ़रा-तफ़री मच ही जाती है।
  359. ज़ोर, सीमा और चरमजल्दी; तेज़दोनों देशों में जल्द से जल्द सुलह हो जाए — यही कामना सभी शोकाकुल परिवारों की गहरी, अटूट इच्छा है।
  360. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावशुरू से हीबातचीत टूट सकती है — इसके अशुभ संकेत वहाँ मौजूद सभी ने पहले ही भाँप लिए थे।
  361. संयोजक और शर्तेंजल्दी; समय से पहलेपहले बता देता तो कुछ किया जा सकता था, पर चुप रहने की वजह से बात ऐसी जगह पहुँच गई जहाँ से लौटना नहीं।
  362. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावपेट; ग़ुस्साबात यहाँ तक पहुँच गई है, तो जब तक हम एक बार खुलकर, दिल की बात न कर लें, यह खाई नहीं पटेगी।
  363. मूल्यांकन और अनिवार्यताचुकाना; भुगतान करनाअनुबंध का उल्लंघन हुआ है, तो जुर्माना चुकाए बिना छुटकारा नहीं मिलेगा।
  364. ज़ोर, सीमा और चरमक्रोध दिलाने वालाऐन समयसीमा से पहले ही स्पेसिफ़िकेशन बदल गए — इससे ज़्यादा खीझ दिलाने वाली बात कोई नहीं।
  365. मूल्यांकन और अनिवार्यताप्रतिस्पर्धा करनाजब उसे चुनौती भरा, दिलचस्प काम सौंपा गया, तो वह पानी में लौटी मछली जैसा हो गया।
  366. संयोजक और शर्तेंअड़ना; ताननाएक शब्द माफ़ी से बात बन जाती, पर वह अकड़ में अंत तक नहीं झुका।
  367. प्रकृति और जीवनकहीं अधिक; दूरबाँध टूटने से हुई बाढ़ अनुमान से कहीं अधिक तेज़ी से शहरी इलाके में फैल गई।
  368. उन्नत व्यावसायिकदायरा; सीमादूसरे पक्ष के वकील के साथ हमने मुआवज़े के दायरे की शर्तें बारीकी से तय कीं।
  369. क़ानून और संस्थाएँफैसला; निर्णयफ़ैसला सुनाए जाने के साथ प्रतिवादी को मुआवज़ा चुकाने का आदेश दिया गया।
  370. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशविद्रोह; प्रतिरोधविद्रोही उम्र के बेटे से माता-पिता बुरी तरह परेशान लगते हैं।
  371. क़ानून और संस्थाएँजटिल; झंझट भराएक-एक जटिल औपचारिकता पूरी करनी पड़ी, और मंज़ूरी आने में पूरे छह महीने लग गए।
  372. तर्क और वाद-विवादप्रतिप्रमाण; खंडनपरिकल्पना कितनी भी आकर्षक क्यों न हो, एक भी प्रतिसाक्ष्य मिल जाए तो सिद्धांत ढह जाता है।
  373. क़ानून और संस्थाएँउल्लंघन करना; विरुद्ध होनानगर-प्रशासन की नीति है कि नगर-अध्यादेश के प्रावधानों के ख़िलाफ़ कोई कार्य पाया जाते ही सुधार की सिफ़ारिश जारी की जाए।
  374. शैक्षणिकआत्ममंथन; पछतावाआधुनिक पश्चिमी चिंतन को बिना आलोचना अपनाते रहने पर आज आत्म-मंथन की माँग उठ रही है।
  375. तर्क और वाद-विवादस्पष्टरिपोर्ट के अलग-अलग अध्यायों के दावे आपस में मेल नहीं खाते, इसलिए समग्र रूप से यह क्या कहना चाहती है, साफ़ नहीं होता।
  376. संयोजक और शर्तेंविपरीत; विरोधमुझे लगा था कि विरोध होगा, पर उल्टे मेरे बॉस ने मेरे प्रस्ताव का ज़ोरदार समर्थन किया।
  377. संयोजक और शर्तेंनिर्णय; परखचूँकि उस शोध की कोई मिसाल पहले नहीं है, इसलिए उसका मूल्यांकन करने वाले भी फ़ैसला करने में उलझन में हैं।
  378. तर्क और वाद-विवादश्रेणी; दायराउस परिघटना का फैलाव इतना है कि वह मौजूदा विद्याओं की श्रेणियों में समाती ही नहीं।
  379. उन्नत व्यावसायिकआधा सालबजट पर सहमति न बन पाने से विलय की बात ठंडे बस्ते में पड़ी रही और यूँ ही छह महीने बीत गए।
  380. मूल्यांकन और अनिवार्यताअर्धचालकदुनिया भर में सेमीकंडक्टर की किल्लत के चलते फ़ैक्ट्री को उत्पादन घटाने पर मजबूर होना पड़ा।
  381. ज़ोर, सीमा और चरमप्रतिक्रियायह तो वही प्रतिक्रिया थी जिसका अंदाज़ा पहले से था, हर बार घबराने की ज़रूरत नहीं।
  382. समाज और सामयिक विषयविरोध; प्रतिक्रियाजनमत के विरोध को जानते हुए भी सरकार उपभोग कर बढ़ाने का क़दम उठाने की तैयारी में है।
  383. भाषा और मीडियाआधायह वाक्य बहुत लंबा है; यही बात आधी लंबाई में कही जा सकती है।
  384. भाषा और मीडियाभेद करनाजब सच-झूठ में फर्क न कर पाने वाली सूचनाओं की बाढ़ आई हो, ठीक तभी आलोचनात्मक चिंतन की परीक्षा होती है।
  385. प्रकृति और जीवनस्पष्ट होनाजिस पुराने स्थल पर मिट्टी का प्रदूषण पाया गया, उसकी सफाई में भारी खर्च लगता था, इसलिए वह लंबे समय तक यूँ ही पड़ा रहा।
  386. भाषा और मीडियाबाढ़; उफानजब सच-झूठ में फर्क न कर पाने वाली सूचनाओं की बाढ़ आई हो, ठीक तभी आलोचनात्मक चिंतन की परीक्षा होती है।
  387. मूल्यांकन और अनिवार्यताजीवनसाथीजिसने बरसों का जीवनसाथी खोया, उसके शोक में कुछ ऐसा है जिसकी कल्पना करना मुश्किल नहीं।
  388. तर्क और वाद-विवादखंडन; प्रतिवादभावनात्मक दलीलें छोड़कर कृपया तर्क की कड़ी जोड़ते हुए ही मेरा प्रतिवाद कीजिए।
  389. मूल्यांकन और अनिवार्यताजगह; मौक़ाजिन अफ़वाहों का अब तक कोई पुख़्ता सबूत नहीं, उन्हें सार्वजनिक मंच पर उठाना ठीक नहीं।
  390. तर्क और वाद-विवादस्थिति; मामलाजब कारण और परिणाम चक्र बना लें, तो कौन पहले है यह कहा नहीं जा सकता, और सीधा-सादा कारण-चित्र काम नहीं आता।
  391. मूल्यांकन और अनिवार्यताबिक्रीमरीज़ों की निजी जानकारी बेच देना — यह किसी चिकित्सक के लिए सर्वथा अशोभनीय कृत्य है।
  392. क़ानून और संस्थाएँक्षतिपूर्ति; हर्जानासिद्धांत यह है कि लापरवाही से हुए नुक़सान की उचित भरपाई का दायित्व नुक़सान पहुँचाने वाले पर होता है।
  393. समाज और सामयिक विषयविशाल; भारीविशाल संपत्ति की विरासत को लेकर रिश्तेदारों के बीच का कड़वा झगड़ा अदालत तक पहुँच गया।
  394. तर्क और वाद-विवादजगह; स्थानकहा जाता है कि गणितीय सत्य की सार्वभौमिकता किसी युग या स्थान से प्रभावित नहीं होती।
  395. क़ानून और संस्थाएँदंड; जुर्मानाजानकारी लीक होने से रोकने के लिए उल्लंघन करने वालों पर कड़े दंड लगाए जाने का प्रावधान है।
  396. मूल्यांकन और अनिवार्यताविशेष चयन; पदोन्नतिउसके जैसी काबिलियत हो, तो उसका चुना जाना स्वाभाविक ही था — कंपनी में यह बात सब मानते हैं।
  397. उन्नत केइगो और औपचारिकताआमूल; मौलिकतंग होते सरकारी वित्त को पटरी पर लाने के लिए खर्च में आमूल सुधार शुरू किया गया।
  398. समाज और सामयिक विषयपैसा बांटना; लोकलुभावन खर्चराजकोषीय अनुशासन की अनदेखी कर रेवड़ियाँ बाँटने वाली नीतियाँ आने वाली पीढ़ियों के लिए भारी मुसीबत छोड़ सकती हैं।
  399. समाज और सामयिक विषयसंतुलनउपभोग कर बढ़ाने पर बहस पूरे कर-ढाँचे के संतुलन को ध्यान में रखकर होनी चाहिए।
  400. संस्कृति और कलापतझड़ का अंतगिरे पत्तों से ढके मंदिर-मार्ग पर देर पतझड़ की अपनी ही छटा तैरती है।
  401. ज़ोर, सीमा और चरमपूर्ण; सर्वांगीणतैयारी पूरी तरह मुकम्मल है। अब बस नतीजे का इंतज़ार करना बाकी है।
  402. तर्क और वाद-विवादसर्वशक्तिमान; सर्वसमर्थदक्षता की अवधारणा को सर्वशक्तिमान मानते-मानते हमने कुछ बहुमूल्य हाथ से गँवा दिया है।
  403. समाज और सामयिक विषयपैन्डे- (महामारी का पहला भाग)इस महामारी ने चिकित्सा-मोर्चे पर कर्मचारियों की पुरानी कमी को फिर से उजागर कर दिया।
  404. मूल्यांकन और अनिवार्यताआगनतीजा दिन के उजाले जितना साफ़ है; दोबारा जाँच करने की कोई ज़रूरत नहीं।
  405. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावगलती; दोषअपनी ग़लती मानकर, सम्मान के साथ ज़िम्मेदारी लेते हुए इस्तीफ़ा देने का उसका रवैया प्रशंसनीय है।
  406. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशठंडा पड़नाअर्थव्यवस्था भले सुधार की राह पर हो, पर लापरवाही ख़तरनाक है — पता नहीं कब माँग ठंडी पड़ जाए।
  407. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावपरहेज़ करना; बचनातय समय के बाद संपर्क न करना — यही इस दफ़्तर की अलिखित समझ है।
  408. तर्क और वाद-विवादतुलनाअमीरी-ग़रीबी का एहसास आख़िरकार सापेक्ष ही है; तुलना का पैमाना बदलते ही वह पूरी तरह बदल जाता है।
  409. वर्णन और अलंकारप्रकाश; रोशनीसाँझ की रोशनी गलियारे में गहरी छायाएँ डाल रही थी और खंभों की रूपरेखा उभार रही थी।
  410. संयोजक और शर्तेंनिराशावादउसमें चीज़ों को निराशावादी नज़रिए से देखने की प्रवृत्ति है।
  411. उन्नत केइगो और औपचारिकताक्षति; नुकसानमैं यहाँ आदरपूर्वक उन सभी के प्रति हार्दिक सहानुभूति व्यक्त करता हूँ जो इस आपदा से प्रभावित हुए हैं।
  412. समाज और सामयिक विषयबढ़ोतरीउपभोग कर बढ़ाने पर बहस पूरे कर-ढाँचे के संतुलन को ध्यान में रखकर होनी चाहिए।
  413. प्रकृति और जीवनबढ़ाना; ऊपर उठानाचेतावनी का स्तर बढ़ाए जाने के बाद संबंधित इलाकों के लिए निकासी का आदेश जारी किया गया।
  414. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावज़िम्मा लेनाउसकी सद्भावना को यूँ ठुकराने में संकोच हुआ, और आख़िरकार मैंने हामी भर दी।
  415. वर्णन और अलंकारवापस लौट सकनाइतनी बड़ी क़ीमत चुका चुकने के बाद अब पीछे लौटना संभव ही नहीं।
  416. समाज और सामयिक विषयसख्ती; कसावमौद्रिक नीति में अचानक सख़्ती उलटे आर्थिक सुधार की कमर तोड़ सकती है।
  417. उन्नत व्यावसायिकनिकालना; बाहर खींचनारियायतें निकलवाने के लिए शुरुआत में ही जान-बूझकर कड़ी माँगें रख देना एक जाना-पहचाना हथकंडा है।
  418. उन्नत व्यावसायिकसंभाल सकनाकाम को व्यक्ति-विशेष पर निर्भर होने से बचाने के लिए प्रक्रियाओं को लिखित रूप देना और उन्हें ऐसा रखना ज़रूरी है कि कोई भी संभाल सके।
  419. वर्णन और अलंकारचले जाना; ले लेनाआपकी अपनी वजहें होंगी, पर मैं आभारी रहूँगा यदि आप अब विदा लेने की कृपा करें।
  420. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावलगना (ज़ुकाम); खींचनाबिछड़ते वक़्त कही उसकी वह एक बात मेरे सीने में देर तक गूँजती रही, कभी मिटी ही नहीं।
  421. संयोजक और शर्तेंपीछे हट सकनामैं ही भरोसा दिला चुका था कि सब ठीक रहेगा, इसलिए अब पीछे हटने की कोई गुंजाइश नहीं बची।
  422. क़ानून और संस्थाएँप्रतिवादीफ़ैसला सुनाए जाने के साथ प्रतिवादी को मुआवज़ा चुकाने का आदेश दिया गया।
  423. प्रकृति और जीवनरोज़मर्राजीवनशैली से जुड़े रोगों में रोज़मर्रा की रोकथाम में की गई लापरवाही का हिसाब वर्षों बाद सामने आता है।
  424. ज़ोर, सीमा और चरमआपदा से प्रभावित होनाआपदा-पीड़ितों में बाँटी जाने वाली राहत सामग्री का एक भी हिस्सा बर्बाद नहीं होना चाहिए।
  425. प्रकृति और जीवनआपात स्थितिविशाल और अत्यंत प्रबल तूफान के निकट आने पर मौसम विभाग अधिकतम स्तर की सतर्कता बरतने की अपील कर रहा है।
  426. तर्क और वाद-विवादछिपा होनाहर सृजन की जड़ में मौजूदा ढाँचों के प्रति एक ख़ामोश असंतोष छिपा रहता है।
  427. मूल्यांकन और अनिवार्यताशोक; विलापजिसने बरसों का जीवनसाथी खोया, उसके शोक में कुछ ऐसा है जिसकी कल्पना करना मुश्किल नहीं।
  428. मूल्यांकन और अनिवार्यताजी-जान सेमेरी जी-तोड़ समझाइश बेकार गई; आख़िरकार उसने इस्तीफ़ा दे ही दिया।
  429. वर्णन और अलंकारचुपचाप; शांति सेवह प्रसिद्ध चित्र किसी अलग-थलग गलियारे के कोने में चुपचाप, बिना किसी की नज़र में आए टँगा था।
  430. मूल्यांकन और अनिवार्यतालेखन शैली; कलम की छापइस कृति की अत्यंत प्रभावशाली शैली पाठक के मन को झकझोरे बिना नहीं रहती।
  431. उन्नत केइगो और औपचारिकतातंगी; दबावतंग होते सरकारी वित्त को पटरी पर लाने के लिए खर्च में आमूल सुधार शुरू किया गया।
  432. तर्क और वाद-विवादअनिवार्यताइतिहास की गति को अनिवार्य मानें या संयोगों का जमावड़ा — इसी पर व्याख्याएँ बुरी तरह बँट जाती हैं।
  433. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशज़रूरी; आवश्यकइस पेचीदा समस्या से जमकर, इत्मीनान से जूझने का हौसला चाहिए।
  434. ज़ोर, सीमा और चरमनकारात्मक; इनकारएक बार की नाकामी के आधार पर उसकी पूरी काबिलियत को नकारना ठीक नहीं।
  435. उन्नत केइगो और औपचारिकताऔरों से अधिकसुना है कि अध्यक्ष महोदय अपने स्वास्थ्य का सबसे अधिक ध्यान रखते हैं।
  436. वर्णन और अलंकारमानव छाया; आकृतिमोमबत्ती की लौ जब-जब काँपती, दीवार पर पड़ती मानव-छाया गहरी होकर फिर मद्धिम पड़ जाती।
  437. ज़ोर, सीमा और चरमव्यक्तित्व; स्वभावचाहे उसका करियर देखें या स्वभाव, वह इस अहम पद के लिए बिलकुल उपयुक्त व्यक्ति है।
  438. संयोजक और शर्तेंएक शब्द; दो बातेंएक शब्द माफ़ी से बात बन जाती, पर वह अकड़ में अंत तक नहीं झुका।
  439. वर्णन और अलंकारबराबर; समानउसकी ख़ामोशी व्यवहार में अपनी ग़लती मान लेने के बराबर ही थी।
  440. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशसाधारण उपाय (से नहीं)जो बातचीत में आसानी से क़ाबू न आए, ऐसे प्रतिपक्ष से अनुभवी राजनयिक तक परेशान हो गया।
  441. तर्क और वाद-विवादएक-एक करकेनिष्कर्ष कहने से पहले उसे पुष्ट करने वाले आधार एक-एक करके ध्यान से रखना ज़रूरी है।
  442. संस्कृति और कलालोगों से मेलजोलशिष्टाचार में कभी कमी न आने देना — यही लोगों से मेलजोल का सबसे पहला सलीका है।
  443. ज़ोर, सीमा और चरमश्रमशक्ति; कामगारकर्मचारियों की कमी से जूझना सिर्फ़ बुज़ुर्ग-देखभाल उद्योग तक सीमित नहीं है।
  444. मूल्यांकन और अनिवार्यतालोगआपदाग्रस्त इलाके के लोगों को कितनी तकलीफ़ झेलनी पड़ी, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं।
  445. संयोजक और शर्तेंलोगों के सामनेपरफ़ेक्ट न सही, पर समयसीमा तक मैं इसे कम से कम दिखाने लायक स्तर तक पहुँचाना चाहता हूँ।
  446. वर्णन और अलंकारलोगों की नज़रवह प्रसिद्ध चित्र किसी अलग-थलग गलियारे के कोने में चुपचाप, बिना किसी की नज़र में आए टँगा था।
  447. समाज और सामयिक विषयअपने आप चल पड़नाक्या ऐसा नहीं कि "टिकाऊपन" शब्द अपने आप में चलता जा रहा है, और उसका मूल आशय खोखला होता जा रहा है?
  448. ज़ोर, सीमा और चरमआत्मनिर्भरताजिस शिष्य को अपने हाथों गढ़ा, उसे अपने पैरों पर खड़ा होते देखना बेहद संतोष की बात है।
  449. मूल्यांकन और अनिवार्यतानिकासी; शरणरिकॉर्ड तोड़ मूसलाधार बारिश के कारण कई निवासियों को शरणार्थी शिविरों में रहने पर मजबूर होना पड़ा है।
  450. ज़ोर, सीमा और चरमदोष निकालने की जगहवह सराय, चाहे खाना देखें या मेहमाननवाज़ी, हर लिहाज़ से बेमिसाल थी।
  451. संयोजक और शर्तेंआलोचनाचाहे कितनी ही आलोचना झेलनी पड़ी हो, उसने अपनी शोध-दिशा कभी नहीं बदली।
  452. मूल्यांकन और अनिवार्यताआलोचना; समीक्षालेखन कच्चा है; यह किसी गंभीर समीक्षा को झेल सकने के स्तर से कोसों दूर है।
  453. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशदैनिक; रोज़ काऊपर के प्रबंधन और नीचे के कर्मचारियों के बीच फँसे मध्य-स्तर के प्रबंधक रोज़ सिर खपाते रहते हैं।
  454. भाषा और मीडियानिंदा; बदनामीगुमनामी की आड़ में छिपकर दूसरों की बदनामी करना किसी भी हाल में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं कहलाया जा सकता।
  455. संयोजक और शर्तेंअवकाश; मौकावह एक बार बोलना शुरू कर दे, तो इतना बोलती चली जाती है कि हामी भरने तक की गुंजाइश नहीं बचती।
  456. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशसमय काटनासफ़र के दौरान भाषा का पॉडकास्ट सुनो तो वक़्त भी कट जाता है और पढ़ाई भी हो जाती है — एक पंथ दो काज।
  457. संस्कृति और कलाखोलना; पड़ताल करनाआधुनिक चिंतन की वंश-परंपरा को खोलें तो उसका उद्गम प्राचीन यूनान में मिलता है।
  458. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशअनुभवी योद्धा; मँजा हुआउस जैसा मँजा हुआ आदमी इतनी बुनियादी ग़लती करे — यही तो है "बड़े-बड़ों से भी चूक हो जाती है"।
  459. तर्क और वाद-विवादछलांग (तर्क में)मान्यता से निष्कर्ष तक की छलाँग इतनी बड़ी है कि सुनने वाला किसी भी तरह साथ नहीं चल पाता।
  460. संयोजक और शर्तेंमूल्यांकनदुनिया इसे सराहे या न सराहे, मैं अपने विश्वास पर डटा रहूँगा।
  461. ज़ोर, सीमा और चरमअभिव्यक्तिभाषा भले ही कच्ची हो, पर इस शोध-पत्र में एक मौलिक सोच चमकती है।
  462. मूल्यांकन और अनिवार्यतासम्मान; प्रशस्तिबरसों की उसकी उपलब्धियाँ देखते हुए, सम्मान का असली हक़दार वही है।
  463. भाषा और मीडियामानकबोली की अपनी खास कहन में ऐसी गरमाहट बसी होती है जिसे मानक भाषा में पूरी तरह उतारा ही नहीं जा सकता।
  464. मूल्यांकन और अनिवार्यतामूल्यांकन करनाइतनी शानदार पूर्णता के आगे 'अद्भुत' के सिवा और कोई शब्द सूझता ही नहीं।
  465. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावदावा करना; झंडा उठानाकुछ लोग विविधता का झंडा उठाते हैं, पर असहमति के प्रति हैरतअंगेज़ ढंग से असहिष्णु होते हैं।
  466. ज़ोर, सीमा और चरमघोषणा; अभिव्यक्तिचाहे पक्ष में हों या विपक्ष में, पहले सबको अपनी राय रखने का मौका मिलना चाहिए।
  467. तर्क और वाद-विवादसतह; ऊपरीजो चाहिए वह ऊपरी-ऊपरी बहस नहीं, बल्कि समस्या के सार को पहचानने वाली दृष्टि है।
  468. ज़ोर, सीमा और चरमसमीक्षा; आलोचनावह टिप्पणीकार लगातार आलोचना करता रहता है — नीति ढीली है, कोई दृष्टि नहीं — पर एक भी विकल्प नहीं सुझाता।
  469. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशख़र्च; लागतअनुबंध पर दस्तख़त करने से पहले मैंने ज़ोर देकर पक्का कर लिया कि कोई अतिरिक्त खर्च नहीं आएगा।
  470. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भाव(अ)तुलनीयकारीगर की लगभग हठ बन चुकी बारीक ज़िद ही इस बेमिसाल गुणवत्ता की नींव है।
  471. ज़ोर, सीमा और चरमअशिष्टतासम्मानित अतिथि के साथ ऐसा लापरवाह बर्ताव — इसे परले दर्जे की अशिष्टता ही कहना पड़ेगा।
  472. उन्नत केइगो और औपचारिकताचौड़ा; विस्तृत"ओ-मेशिआगारि-नि-नारु" दरअसल दोहरा आदरसूचक रूप है, फिर भी प्रचलन में इसे व्यापक रूप से स्वीकार किया जाता है।
  473. ज़ोर, सीमा और चरमथकानलगातार कई रातें जागते बीतीं, अब तन और मन दोनों थकान की चरम सीमा पर पहुँच चुके हैं।
  474. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशफैलनाछँटनी की अफ़वाहें फैलने के बाद से दफ़्तर में आपसी शक का माहौल है और हर कोई एक-दूसरे पर नज़र रखे हुए है।
  475. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशफैलानाकारोबार में विविधता के नाम पर हाथ ज़्यादा फैलाओगे, तो दो नावों वाली हालत हो जाएगी और मुख्य धंधे की रीढ़ तक हिल सकती है।
  476. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावगरिमा; चरित्रहार को गरिमा के साथ स्वीकार करने के ढंग में ही असली शालीनता झलकती है।
  477. समाज और सामयिक विषयग़रीबीग़रीबी के चक्र को तोड़ने के लिए, मेरी राय में, बच्चों पर निवेश में कंजूसी नहीं करनी चाहिए।
  478. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावगुणवत्ताकारीगर की लगभग हठ बन चुकी बारीक ज़िद ही इस बेमिसाल गुणवत्ता की नींव है।
  479. तर्क और वाद-विवादअमीरी-गरीबीअमीरी-ग़रीबी का एहसास आख़िरकार सापेक्ष ही है; तुलना का पैमाना बदलते ही वह पूरी तरह बदल जाता है।
  480. तर्क और वाद-विवादसौंदर्यसुंदरता की धारणा युगों के साथ डोलती रहती है और कभी किसी एक साँचे में नहीं बैठती।
  481. संस्कृति और कलासौंदर्य बोधपरिष्कृत सौंदर्य-बोध रातोंरात नहीं गढ़ा जाता।
  482. जीवन और मूल्यसौंदर्यशास्त्रहर फालतू चीज़ छाँट देने का उसका सौंदर्यबोध कृति के कोने-कोने तक बरता गया था।
  483. शैक्षणिकसूक्ष्म; बारीकछवि-विश्लेषण की तकनीक बेहतर होने से अब सूक्ष्म रोग-चिह्न भी शुरुआती चरण में पकड़े जा सकते हैं।
  484. वर्णन और अलंकारकला संग्रहालयदेर रात का संग्रहालय, जहाँ किसी दर्शक की आहट तक न थी, एक तनी हुई ख़ामोशी में डूबा था।
  485. ज़ोर, सीमा और चरमसूक्ष्म; नाज़ुकउस एक घटना के बाद से दोनों के बीच एक बारीक-सी दरार पैदा हो गई है।
  486. ज़ोर, सीमा और चरमअस्पतालबरसों तक इलाके की स्वास्थ्य-सेवा संभालने के मामले में इस अस्पताल से भरोसेमंद कोई और नहीं।
  487. ज़ोर, सीमा और चरमसमानताचाहे मंत्री हो या आम नागरिक, क़ानून के सामने सबके साथ बराबर बर्ताव होना चाहिए।
  488. संयोजक और शर्तेंअल्प शक्ति (विनम्र)मेरी क्षमता भले ही सीमित हो, फिर भी अपनी थोड़ी-सी शक्ति लगाकर मैं आप सबके काम आना चाहता हूँ।
  489. जीवन और मूल्यकेंद्र; पीठविद्या का धाम होने के नाते विश्वविद्यालय समाज की अंतरात्मा की भूमिका निभाता है।
  490. ज़ोर, सीमा और चरमचिंता; बेचैनीकम या ज़्यादा, बुढ़ापे को लेकर चिंता हर किसी के मन में होती ही है।
  491. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांश(स्मृति का) धुँधलानामहाभूकंप के सबक धुँधले न पड़ें, इसके लिए पूरे समाज को "तैयारी हो तो चिंता नहीं" की सोच अपनानी चाहिए।
  492. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावव्यक्तित्व की शान; शैलीहठ और कोरी ज़िद में बाल बराबर का फ़र्क है, पर जिस हठ के पीछे विश्वास हो उसमें एक तरह की गरिमा होती है।
  493. वर्णन और अलंकारदमन; मुंह बंद करनाअगर आपत्ति उठाने का मौका तक न दिया जाए, तो यह अभिव्यक्ति की आज़ादी का गला घोंटने के बराबर है।
  494. संस्कृति और कलाप्रथा; रिवाजइलाक़े के हिसाब से आज भी ऐसी जगहें हैं जहाँ दुल्हन के विवाह से जुड़ी अनोखी रीतियाँ बची हुई हैं।
  495. उन्नत व्यावसायिकदबाना; रोक देनाअसहमति को दबाकर बनी सहमति अमल के वक़्त बड़ी आसानी से भरभराकर गिर जाती है।
  496. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशप्रवृत्ति; चलनबार-बार नौकरी बदलने के इस दौर में कुछ लोग "तीन साल टिके रहो" वाली सोच को पुराना बताकर ख़ारिज कर देते हैं।
  497. शैक्षणिकबढ़नाबस एक चर बढ़ते ही गणना का भार घातीय रूप से फूल जाता है।
  498. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावअशांत; अशुभबातचीत टूट सकती है — इसके अशुभ संकेत वहाँ मौजूद सभी ने पहले ही भाँप लिए थे।
  499. प्रकृति और जीवनभार; बोझविशेषज्ञ कहते हैं कि आर्थिक वृद्धि और पर्यावरणीय बोझ में कमी को साथ साधना कतई परस्पर विरोधी नहीं है।
  500. मूल्यांकन और अनिवार्यतागहरावह चौंका देने वाला अंत दर्शकों के मन पर गहरी छाप छोड़े बिना नहीं रहता।
  501. मूल्यांकन और अनिवार्यताअपरिहार्य; अनिवार्ययह कहने की ज़रूरत नहीं कि इस अनुबंध पर दोनों पक्षों के हस्ताक्षर अनिवार्य हैं।
  502. शैक्षणिकगहरानापीढ़ियों के बीच मूल्यों की खाई इतनी गहरी हो चुकी लगती है कि उसे पाटना अब लगभग नामुमकिन है।
  503. मूल्यांकन और अनिवार्यतागहराईइस कृति में इतनी गहराई है कि इसे बार-बार देखा-परखा जा सकता है।
  504. उन्नत व्यावसायिकगहरा करनादोनों पक्षों के तर्कों को एक बार व्यवस्थित करने के बाद मैं चर्चा को फिर से गहरा करना चाहूँगा।
  505. संस्कृति और कलाअपूर्णवाबी-साबी उस संवेदना को कहते हैं जो अधूरी और क्षय होती चीज़ों में सुंदरता खोज लेती है।
  506. शैक्षणिकप्रसार; व्यापक होनाअगर क्वांटम एन्क्रिप्शन आम हो गया, तो मौजूदा एन्क्रिप्शन तरीक़े जड़ से पलट सकते हैं।
  507. ज़ोर, सीमा और चरममंदीतेज़ी हो या मंदी, जो कंपनी शोध और विकास में निवेश से मुँह मोड़ेगी, उसका कोई भविष्य नहीं।
  508. प्रकृति और जीवनदुष्प्रभावयह दवा बहुत असरदार है, मगर दूसरी ओर इसके दुष्प्रभाव भी नज़रअंदाज़ नहीं किए जा सकते।
  509. तर्क और वाद-विवादजटिलता; जटिलतर्क की संगति के पीछे भागते-भागते हमें वास्तविकता की जटिलता हाथ से नहीं जाने देनी चाहिए।
  510. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशगिरा हुआ पानीएक बार जो कड़वे बोल निकल गए, वे बिखरे पानी की तरह हैं — कितनी भी माफ़ी माँगो, खोया भरोसा लौटता नहीं।
  511. उन्नत व्यावसायिककई; एकाधिककई सहायक कंपनियों की देखरेख करने वाली होल्डिंग कंपनी बनने से समूह के निर्णय एक जगह केंद्रित हो गए।
  512. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावछिपा अर्थ; निहितार्थविभागाध्यक्ष का यह कहना — "चलो, आगे देखेंगे" — साफ़ तौर पर कोई अनकही बात छिपाए था।
  513. शैक्षणिकशामिल होना; समाहित करनाअवलोकन के आँकड़ों में छिपी त्रुटियों का बारीकी से विश्लेषण कर हमने उपकरण की अपनी विशिष्ट झुकावों को ठीक किया।
  514. समाज और सामयिक विषयफूलना; बढ़नाबढ़ता सामाजिक सुरक्षा खर्च देश के राजकोष पर भारी दबाव डाल रहा है।
  515. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशख़राबी; त्रुटिहमने इसे मामूली ख़राबी समझकर हल्के में लिया, पर लापरवाही महँगी पड़ी और आख़िरकार बात बड़े पैमाने पर रीकॉल तक पहुँच गई।
  516. ज़ोर, सीमा और चरमउपयुक्त; योग्यचाहे उसका करियर देखें या स्वभाव, वह इस अहम पद के लिए बिलकुल उपयुक्त व्यक्ति है।
  517. भाषा और मीडियाअस्वाभाविकशब्दों के भाव की अनदेखी कर शब्दशः अनुवाद करें तो अर्थ तो पहुँच जाता है, मगर अनुवाद कहीं न कहीं अस्वाभाविक हो जाता है।
  518. ज़ोर, सीमा और चरमघोटाला; कांडइस घोटाले में जिस टीम ने पर्दा डाला वह भी दोषी है, और जिस मुख्यालय ने आँखें मूँद लीं वह भी।
  519. ज़ोर, सीमा और चरमअविश्वासहादसे के बाद की कार्रवाई भी ऐसी-वैसी और प्रेस-वार्ता में दी गई सफ़ाई भी वैसी ही — जनता का भरोसा टूटा तो कोई अचरज नहीं।
  520. शैक्षणिकअपर्याप्तसमीक्षक ने बताया कि कारण-संबंध सिद्ध करने के लिए महज़ सहसंबंध काफ़ी नहीं है।
  521. क़ानून और संस्थाएँ(के लिए) सौंपना; भेजनायदि पक्षकारों के बीच सहमति न बने, तो मामला मध्यस्थता के लिए भेजा जाएगा।
  522. तर्क और वाद-विवादअनियमितता; भ्रष्टाचारव्यवस्थाएँ कितनी भी दुरुस्त कर लो, जब तक मानव-स्वभाव नहीं बदलता, भ्रष्टाचार नहीं मिटेगा।
  523. मूल्यांकन और अनिवार्यताबेईमान; कपटीइतने लंबे समय तक ऐसा बेईमानी भरा बर्ताव झेलना पड़े, तो ग्राहकों का ग़ुस्सा होना लाज़मी है।
  524. क़ानून और संस्थाएँरोकनाजानकारी लीक होने से रोकने के लिए उल्लंघन करने वालों पर कड़े दंड लगाए जाने का प्रावधान है।
  525. संस्कृति और कलाआकर्षण; माहौलगिरे पत्तों से ढके मंदिर-मार्ग पर देर पतझड़ की अपनी ही छटा तैरती है।
  526. जीवन और मूल्यअनुपयुक्तअपनी हैसियत से बड़ी महत्वाकांक्षा पालने से बेहतर है कि मैं अपनी सीमा के अनुरूप सुख की तलाश करूँ।
  527. संयोजक और शर्तेंकमीयह जानकारी की कमी से पैदा हुई ग़लतफ़हमी थी, इसमें कोई बदनीयती नहीं थी।
  528. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशफिर सेबरसों की कड़वाहट को भुलाकर दोनों ने फिर से हाथ मिलाने का फ़ैसला किया।
  529. प्रकृति और जीवनदोचिकित्सकों का दल उपचार की दिशा को लेकर ठीक दो हिस्सों में बँट गया।
  530. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशबोझघर से काम की व्यवस्था ने आने-जाने का बोझ भी घटाया और उत्पादकता भी बढ़ाई — सचमुच एक पंथ दो काज।
  531. संयोजक और शर्तेंआमतौर परदेखने में वह शांत स्वभाव का लगता है, पर जैसे ही बहस शुरू होती है, वह सबसे ज़्यादा जोश से अपनी बात रखता है।
  532. संयोजक और शर्तेंवापसीतबीयत भी ठीक हो गई है, इसलिए मैं अगले हफ़्ते से काम पर लौटने का इरादा रखता हूँ।
  533. प्रकृति और जीवनबहालीआपदाग्रस्त क्षेत्र की बहाली जैसे-जैसे लंबी खिंचती गई, स्वयंसेवकों की संख्या साफ़ दिखने लायक घटती चली गई।
  534. प्रकृति और जीवनपुनर्निर्माणबहाली और पुनर्निर्माण की लंबी राह का पहला कदम वर्तमान स्थिति की सटीक समझ से ही शुरू होता है।
  535. क़ानून और संस्थाएँअनुचित; अन्यायपूर्णबिना उचित कारण किसी कर्मचारी को निकालने पर अनुचित बर्ख़ास्तगी की ज़िम्मेदारी तय होगी।
  536. समाज और सामयिक विषयअनिश्चितता; अस्पष्टताअर्थव्यवस्था का भविष्य अनिश्चित होने के कारण कंपनियाँ पूँजी-निवेश से हाथ खींच रही हैं।
  537. उन्नत केइगो और औपचारिकताअधर्म; नैतिक कमीमेरी ही कमियों के कारण आपको इतनी असुविधा हुई — इसके लिए मुझे गहरी लज्जा है।
  538. ज़ोर, सीमा और चरमपदस्थापनविदेश में तैनाती का अनुभव लेने के बाद से उसका नज़रिया कहीं ज़्यादा व्यापक हो गया है।
  539. उन्नत व्यावसायिककमी; त्रुटिलेखा-परीक्षा में बताई गई कमियों पर हमारी नीति है कि समय-सीमा तय करके शीघ्र सुधारात्मक क़दम उठाए जाएँ।
  540. समाज और सामयिक विषयअसमानताआर्थिक असमानता का बढ़ना शिक्षा के अवसरों की गैरबराबरी के ज़रिए पीढ़ी दर पीढ़ी दोहराया जाता है।
  541. ज़ोर, सीमा और चरमशिकायत; असंतोषहर बैठक में बस शिकायतें ही उड़ती रहती हैं — बजट कम है, लोग कम हैं, वग़ैरह-वग़ैरह।
  542. मूल्यांकन और अनिवार्यतासार्वभौमिकताआधी सदी बाद भी यह पढ़ने लायक इसलिए है, क्योंकि यह सचमुच सार्वभौमिक विषय को छूती है।
  543. मूल्यांकन और अनिवार्यतामृत्यु का समाचारअपने गुरु के अचानक निधन का समाचार पाकर मैं गहरे शोक से भर उठा हूँ।
  544. समाज और सामयिक विषयके आधार पर; ध्यान में रखनाउपभोग कर बढ़ाने पर बहस पूरे कर-ढाँचे के संतुलन को ध्यान में रखकर होनी चाहिए।
  545. ज़ोर, सीमा और चरमअसंतोषअगर शिकायत है, तो सीधे कहो या लिखित में दो — सही प्रक्रिया से आगे बढ़ो।
  546. मूल्यांकन और अनिवार्यताकदम रखना"इस भूमि पर पैर न रखो" — पुराने सूचना-पट्ट पर यही लिखा था।
  547. समाज और सामयिक विषयकदम उठाना; निर्णय लेनाराजकोषीय सुधार के लिए कर बढ़ाया जाए या नहीं — इस राह के औचित्य पर बहस चल रही है।
  548. जीवन और मूल्यघुसना; गहराई में जानाबॉस के साथ कितनी दूरी रखूँ, यह मैं तय नहीं कर पाता और कहाँ तक आगे बढ़ूँ, इसी में हमेशा नसें घिसती रहती हैं।
  549. क़ानून और संस्थाएँकुचलना; रौंदनावजह चाहे जो भी हो, मज़दूरों के अधिकारों को एकतरफ़ा रौंदना कभी उचित नहीं ठहराया जा सकता।
  550. क़ानून और संस्थाएँकुचलना; पैर रखनाएक-एक जटिल औपचारिकता पूरी करनी पड़ी, और मंज़ूरी आने में पूरे छह महीने लग गए।
  551. मूल्यांकन और अनिवार्यताअस्पष्ट; अज्ञातजब भी मैं अपनी नासमझी पर सोचता हूँ, गहरी शर्मिंदगी से भर जाता हूँ।
  552. वर्णन और अलंकारसर्दी; शीत ऋतुइस साल की सर्दी असाधारण रूप से कड़ी रही, और कई जगहों पर रिकॉर्ड बर्फ़बारी दर्ज हुई।
  553. जीवन और मूल्यनुक़सान; प्रतिकूलजिससे उपकार मिला हो, उसके प्रति अपने नुकसान पर भी सही राह पर चलना ही इंसानियत है।
  554. जीवन और मूल्यपीछे मुड़कर देखनाजो दिन कठिन थे, पीछे मुड़कर देखूँ तो अब लगता है कि वे भी जीवन को रंग देने वाली खुराक थे।
  555. वर्णन और अलंकारगिरकर जमना (बर्फ)बर्फ़ से ढकी देर रात की सड़कों पर ऐसी ख़ामोशी फैली थी मानो उसने हर आवाज़ सोख ली हो।
  556. मूल्यांकन और अनिवार्यतापुरानामरम्मत की मेहनत रंग लाई — वह पुराना मकान पहचान में न आने की हद तक रहने लायक हो गया।
  557. संस्कृति और कलाप्राचीन काल सेहमारे घर में साल के आख़िरी दिन पूरे बरस की धूल झाड़ना पुरानी परंपरा है।
  558. वर्णन और अलंकारप्राचीन मंदिरढलते सूरज की रोशनी में नहाया वह प्राचीन मंदिर लंबी छाया खींचते हुए अपनी भव्य उपस्थिति उभार रहा था।
  559. तर्क और वाद-विवादआचरण; व्यवहारउसका वह बर्ताव ऐसा था जिसे सामान्य समझ के दायरे में किसी भी तरह समझाया नहीं जा सकता था।
  560. मूल्यांकन और अनिवार्यताव्यवहार करनामातहत की उपलब्धि को अपने नाम कर लेना — नेतृत्व के पद पर बैठे व्यक्ति के लिए यह बिलकुल अशोभनीय आचरण है।
  561. वर्णन और अलंकारव्यवहार करनावह तानाशाह ख़ुद को भगवान की तरह पेश करता था और उसी अंदाज़ में जनता पर राज करता था।
  562. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावछूनाकिसी ने कहा तो नहीं, पर यह अलिखित समझ बनी हुई थी कि उस विषय को छुआ नहीं जाएगा।
  563. उन्नत केइगो और औपचारिकतामाहौलविशिष्ट अतिथियों के एक के बाद एक पधारने से सभागार उल्लासपूर्ण वातावरण में डूब गया।
  564. क़ानून और संस्थाएँविवाद; संघर्षविवाद सुलझाने के लिए दोनों पक्षों का एक-दूसरे की ओर बढ़ना अनिवार्य है।
  565. संयोजक और शर्तेंअधीनस्थ; मातहतअगर तुम मातहतों की ग़लती पर बिना सुने ही डाँटते रहोगे, तो एक दिन उनका भरोसा खो दोगे।
  566. उन्नत केइगो और औपचारिकताविभागइस विषय में संबंधित विभाग से पुष्टि करके मैं बाद में आपको उत्तर दूँगा।
  567. ज़ोर, सीमा और चरमसकुशल; सुरक्षितमैं बस इतना ही कर सकता था कि उसकी सलामती की दुआ माँगूँ।
  568. मुहावरे और रूढ़ वाक्यांशअपमानएक बार जो अपमान मुँह से निकल गया, उसे यूँ आसानी से भुलाया नहीं जा सकता।
  569. उन्नत केइगो और औपचारिकताविभाग प्रमुखक्या विभागाध्यक्ष महोदय ने नई परियोजना-प्रस्ताव पर नज़र डाल ली है?
  570. संयोजक और शर्तेंकीमतें; महँगाईतनख़्वाह बढ़ी तो सही, पर महँगाई को देखें तो असल में जीवन और मुश्किल ही हो गया है।
  571. ज़ोर, सीमा और चरमसामग्री; आपूर्तिआपदा-पीड़ितों में बाँटी जाने वाली राहत सामग्री का एक भी हिस्सा बर्बाद नहीं होना चाहिए।
  572. तर्क और वाद-विवादभौतिकगवाही और भौतिक साक्ष्य के बीच तालमेल बैठे, तभी वह अनुमान असरदार बनता है।
  573. मनोविज्ञान और सूक्ष्म भावटकराना; निकालना (गुस्सा)ऐसा ग़ुस्सा जिसे कहीं उतारा ही न जा सके, मन को लाचार बेचैनी से भर देता है।
  574. शैक्षणिकभौतिकीयह सिद्धांत सिर्फ़ भौतिकी में नहीं, आर्थिक परिघटनाओं को समझने में भी काम आता है।
  575. प्रकृति और जीवनमाल परिवहनआपूर्ति नेटवर्क टुकड़ों में कट जाने के कारण आपदाग्रस्त क्षेत्र तक सामान पहुँचाना अत्यंत कठिन हो गया है।
  576. उन्नत व्यावसायिकविभागजब हर विभाग की अपनी गणित उलझी हो, तो सहमति बनाने के लिए पहले टकराते हितों के बिंदु साफ़ करने ज़रूरी हैं।
  577. समाज और सामयिक विषयसंस्कृतिबहुसांस्कृतिक सहअस्तित्व का आदर्श साकार करने के लिए व्यवस्थागत इंतज़ाम के साथ-साथ हर नागरिक की सोच में बदलाव अनिवार्य है।
  578. प्रकृति और जीवनअपघटनअपशिष्ट प्लास्टिक को रासायनिक रूप से तोड़कर कच्चे माल के रूप में लौटाने वाली तकनीक को शीघ्र व्यावहारिक बनाना ज़रूरी है।
  579. मूल्यांकन और अनिवार्यतासांस्कृतिक धरोहरसांस्कृतिक धरोहर की इतनी लापरवाही से देखभाल हो रही है — यह देखकर गहरा खेद होता है।
  580. भाषा और मीडियासाहित्यिक भाषाबोलचाल में जो कारक-चिह्न अक्सर छूट जाते हैं, वे साहित्यिक शैली के लेखन में प्रायः पूरी नियमबद्धता से जोड़ दिए जाते हैं।
  581. ज़ोर, सीमा और चरमदस्तावेज़वजह चाहे जो भी हो, बिना अनुमति गोपनीय दस्तावेज़ बाहर ले जाना कतई माफ़ी लायक नहीं।
  582. मूल्यांकन और अनिवार्यतालेख; लेखनलेखन कच्चा है; यह किसी गंभीर समीक्षा को झेल सकने के स्तर से कोसों दूर है।
  583. शैक्षणिकविश्लेषणविश्लेषण से पता चला कि आय पर शिक्षा-स्तर का प्रभाव सार्थक नहीं था।
  584. समाज और सामयिक विषयविभाजनआय की खाई का बढ़ना एक गंभीर समस्या है, जो समाज में दरार पैदा कर सकती है।
  585. प्रकृति और जीवनवितरणसीमित संसाधनों का न्यायसंगत बँटवारा कैसे हो, यह इक्कीसवीं सदी के सबसे तीखे राजनीतिक प्रश्नों में से एक है।
  586. तर्क और वाद-विवादसंदर्भभले-बुरे के मानदंड निरपेक्ष नहीं होते; वे प्रसंग पर निर्भर, सापेक्ष भर होते हैं।
  587. संस्कृति और कलासभ्यताकिसी सभ्यता का उत्थान और पतन कभी संयोग का परिणाम नहीं होता; प्रायः वह एक अनिवार्य परिणति होती है।